Thursday, 12 December 2013

'आप' ने क्यों सबको साँप सुँघा दिया?


'आप' ने सबको साँप सुँघा दिया है. उनकी हालत तो पतली है ही, जिनके हाथ की भाग्य रेखा इस चुनाव में देखते ही देखते सफ़ाचट हो गयी. लेकिन जो चौतरफ़ा जीते, उन हुँकार वालों की भी धुकधुकी लग गयी है. और सूबों के क्षत्रपों के भी दिल बैठने लगे हैं. 'आप' की झाड़ू ने राजनीति के तमाम टोटकों को ठिकाने लगा दिया. चुनाव के पहले और चुनाव के बाद, हर मौक़े पर कामयाबी की पूरी गारंटी वाले अचूक ख़ानदानी नुस्ख़े इस बार कुछ काम नहीं आये, वरना अब तक दिल्ली में तीन-तिकड़म से सरकार बनाने का जुगाड़ कब का हो चुका होता! 

भारतीय राजनीति में यह अजूबा सचमुच पहली बार हो रहा है कि सबसे ज़्यादा सीटें जीतनेवाली पार्टी को ज़रा भी इच्छा नहीं हो रही है कि वह सरकार बनाने की कोशिश करे! यह वही पार्टी है जो केन्द्र में तेरह दिन की सरकार बनाने के लिए लड़ मरी थी. आज उसे जोड़तोड़ कर सरकार बनाना अनैतिक लगने लगा है! झारखंड भी अभी कोई कालातीत इतिहास नहीं हुआ है कि लोगों को याद न आये कि बीजेपी ने वहाँ सरकार बनाने या सरकारों में बने रहने के लिए कैसे-कैसे अद्भुत कौशल दिखाये थे. लेकिन आज वह बहुमत से केवल चार के आँकड़े से दूर रह जाने के बावजूद कान पकड़े बैठी है कि न बाबा न, हम 'अनैतिक' तरीक़ों से सरकार नहीं बनायेंगे! 

'आप' यानी आम आदमी पार्टी का यही असर और आतंक है, जिसने राजनीति के ढर्रे को बदलने की शुरुआत की है. और, दरअसल, यह आतंक पार्टी का नहीं, बल्कि सचमुच आम आदमी का है. 'आप' के बहाने आम आदमी ने राजनीति में सीधे हस्तक्षेप की शुरुआत कर दी है. हाल के विधानसभा चुनावों की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही है कि आम आदमी ने दिल्ली में एक नये राजनीतिक प्रयोग की नींव रखी, आम आदमी पहली बार ख़ुद चुनाव लड़ा और जीता और पके-पकाये राजनेताओं और राजनीति के तमाम घाघ खिलाड़ियों के हर छल-बल को उसने अपनी मामूली-सी हस्ती के बावजूद बेअसर कर दिया. अब यह अलग बात है कि रामलीला मैदान में जब जनलोकपाल की माँग को लेकर अन्ना हज़ारे आमरण अनशन कर रहे थे, तब लबालब अहंकार से भरे इन्हीं राजनेताओं ने ताने मार-मार कर आम आदमी की बड़ी खिल्ली उड़ायी थी कि ऐसे ही क़ानून बनाने का बड़ा शौक़ है तो राजनीति में उतर कर देखो. अन्ना और आन्दोलन से जुड़े तमाम सहयोगियों-समर्थकों के भारी  विरोध के बावजूद जब 'आप' नाम की पार्टी बनी तब किसी ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया था. लेकिन 'आप' ने अब तक अपने बारे में लगायी जा रही तमाम अटकलों, आशंकाओं, अनुमानों और आकलनों को पूरी तरह ग़लत साबित किया है. 

'आप' के अलावा भी इस बार के विधानसभा चुनाव इसलिए बड़े कौतूहल से देखे जा रहे थे कि इन्हें 2014 की लड़ाई की अँगड़ाई माना जा रहा था. बात सही भी है. देश के राजनीतिक इतिहास में ऐसा चुनावी युद्ध शायद ही पहले कभी हुआ हो. नेतृत्व के संकट से जूझ रही काँग्रेस अपने अस्तित्व के लिए छटपटा रही है, बीजेपी को लगता है कि यह उसके लिए 'अभी नहीं तो कभी नहीं' जैसा मौक़ा है और नरेन्द्र मोदी के आक्रामक नेतृत्व में वह देश की राजनीति की धारा बदल सकने के सर्वोत्तम अवसर के मुहाने पर खड़ी है. उधर मुलायम, माया, ममता, जयललिता, नीतिश, नवीन, जगन, चन्द्रबाबू समेत तमाम सूबाई क्षत्रपों को लगता है कि यही मौक़ा है, जब चुनाव बाद उनकी बड़ी भूमिका हो सकती है और कौन जाने देवेगौड़ा और गुजराल की तरह किसी का प्रधानमंत्री बनने का नम्बर भी लग जाये! अब तक यह सब गणित ठीक चल रहा था, लेकिन दिल्ली फ़तह के बाद 'आप' के 'भारत विजय' के इरादों ने अब तक बड़ी मेहनत से सजाई गयी  चौसर में नये पाँसे फेंक कर पूरा खेल तहस-नहस कर दिया है.

'आप' के साथ समस्या यह है कि परम्परागत राजनीति के दाँव से न यह खेलती है और न वे इस पर असर करते हैं. यह अनुमान भी नहीं लग पाता कि कहाँ इसके उम्मीदवार मज़बूत हैं और कहाँ कमज़ोर, कहाँ इसके समर्थक कम हैं, कहाँ ज़्यादा, क्योंकि इसके समर्थकों की कोई ख़ास पहचान है ही नहीं. इसके चुनाव प्रचार से भी पकड़ पाना मुश्किल होता है कि कहाँ इसकी अपील है और कहाँ नहीं. न बड़ी रैलियाँ और न न्यूज़ चैनलों पर 'लाइव प्रसारित' हो सकने वाले भाषण! इसलिए पता ही नहीं चलता कि वे चुनाव लड़ भी रहे हैं या नहीं, लड़ पा रहे हैं या नहीं. दिल्ली में यही हुआ. मतदान के बाद तक बड़े-बड़े चुनावी पंडितों, एक्ज़िट पोल मास्टरों को 'आप' की कोई हवा ही नहीं लग सकी! 

ऐसे में लोकसभा चुनावों में उतरने का 'आप' का फ़ैसला बीजेपी समेत सभी पार्टियों के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है. कारण यह है कि काँग्रेस-विरोध की मौजूद लहर में 'आप' बहुत-से लोगों को एक नया विकल्प देती है. दिल्ली के नतीजे इसका सबूत हैं. अगर यहाँ 'आप' मैदान में न होती तो बीजेपी शायद  50 से भी ज़्यादा सीटें जीतती! बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहाँ बीजेपी बड़ी फ़सल काटने के लिए पूरी ताक़त झोंक रही है, 'आप' वहाँ न केवल नरेन्द्र मोदी और बीजेपी के लिए 'स्वप्नभंग' का कारण बन सकती है, बल्कि मुलायम, मायावती, नीतिश और लालू छाप राजनीति को भी बड़े झटके दे सकती है. हालाँकि अभी कोई राजनीतिक पंडित यह मानने को क़तई तैयार नहीं है कि इन राज्यों के जातीय गणित को तोड़ पाना तो दूर, कभी कोई खरोंच भी लगा सकता है. लेकिन 'आप' ने दिल्ली के दलित वोटों में भारी सेंध लगा कर ख़तरे की घंटी बजा ही दी है. आम आदमी को 'आप' के ज़रिये देश के राजनीतिक पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का जो मौक़ा मिला है, उसके नतीजे न केवल अगले लोकसभा चुनाव को गहरे प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि दूसरे राजनीतिक दलों को नैतिकता की टोपी पहनने को भी मजबूर कर सकते हैं! विधानसभा चुनावों का सबसे बड़ा नतीजा यही है.
( ---क़मर वहीद नक़वी, 'अमर उजाला', 12 दिसम्बर, 2013)

Tuesday, 19 November 2013

बताइए, आपको कौन-सी जीत चाहिए?

आप जीतना चाहते हैं! भला कौन ऐसा होगा, जो जीतना न चाहे? हर कोई चाहता है कि वह जीते और हमेशा जीतता रहे. लेकिन क्या सभी जीत सकते हैं? क्या यह सम्भव है कि युद्ध में या खेल में, संघर्ष में या विमर्श में सभी जीत जायें! नहीं सम्भव है न! क्योंकि सब जीत नहीं सकते. एक जीतेगा, तो दूसरा हारेगा! किसी की हार के बिना कोई जीत सम्भव नहीं. जीतने में ही निहित है किसी का हारना, किसी को हराना! अब यह जीत- हार किसी की भी हो सकती है, किसी व्यक्ति की, किसी राष्ट्र की, किसी विचार की, किसी अवधारणा की, किसी व्यवस्था की, किसी परम्परा की, किसी रूढ़ि की, किसी स्थिति की, किसी प्रवृत्ति की. प्रवृत्ति जैसे असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर अच्छाई की विजय, स्थिति जैसे प्रकृति पर मनुष्य की विजय! कँटीले जंगलों और पत्थर के हथियारों से शुरू होकर आज कंक्रीट के शहरों और परमाणु हथियारों तक मानव की यात्रा दुरूह, विकट और असम्भव-सी लगनेवाली सतत विजय-गाथाओं का एक निरन्तर महाकाव्य है.

लेकिन संसार की यह शाश्वत नैसर्गिक इच्छा रही है कि जो अच्छा हो वही जीते. जो हितकर हो, जो कल्याणकारी हो, वही जीते. आप आदिम इतिहास से लेकर अब तक की मानव सभ्यता की यात्रा और संघर्षों पर नज़र डालें, तो पायेंगे कि तमाम प्रवृत्तियों के असंख्य युद्धों में हिटलर से हिरोशिमा तक कुछेक गिनती के अपवादों को छोड़ कर अगर अन्ततः अच्छाई की विजय न हुई होती, तो संसार आज इतना विकसित, इतना सभ्य, इतना व्यवस्थित न होता और चुटकी भर भी लोकतांत्रिक न हो पाता. और गिनती के जिन अपवादों में कुख्यात व्यक्तियों और प्रवृत्तियों को तात्कालिक विजय मिली भी, उन्हें भी अन्ततः कुछ वर्षों की सत्ता और वर्चस्व के बाद पराजित हो कर इतिहास के क़ब्रिस्तान में दफ़न होना पड़ा. निष्कर्ष क्या है? यही कि समय कैसा भी रहा हो, युग कोई भी हो, परिस्थितियाँ कैसी भी रही हों, शुरू में, और हो सकता है कुछ वर्षों तक कोई भी जीतता हुआ दिखा हो, लेकिन अन्तिम विजय उसी की हुई, जिसके जीतने की प्रबल इच्छा मनुष्य की सामूहिक विश्व चेतना ने की. अन्ततः वही जीता, जिसे मानव समाज और संसार के व्यापक हित में जीतना चाहिए था!

आज के समय में, जब जीत को जीवन के नये महामंत्र के रूप में स्थापित किया जा रहा है, जीत के इस बुनियादी सूत्र को समझना बेहद महत्त्वपूर्ण है कि जीत वह है, जिससे कुछ अच्छा होता हो, जिससे कोई ऐसा बदलाव हो जो पहले से कुछ अच्छा हो. हमारे हज़ारों बरसों के इतिहास का निचोड़ यही है. आप कल्पना करें कि अगर अब तक हमेशा बुराइयाँ जीत रही होतीं तो आज हमारी दुनिया कैसी होती? क्या यह दुनिया रह पाने लायक़ होती? क्या हम यह संवाद भी कर पाने की स्थिति में होते? हम चैन से जीते रहें, इसके लिए अच्छाइयों का जीतना ज़रूरी है. यही मनुष्य की चेतना का मूल उद्घोष है कि जो अच्छा हो, वह विजयी रहे. ज़रूरी है कि जीत से कुछ अच्छा घटित हो, कुछ अच्छा मिले, हमें भी, हमारे समाज को भी, हमारे देश को भी, संसार को भी.

लेकिन आज जिस 'जीत' की सबको घुट्टी पिलायी जा रही है, वह जीत नहीं, बल्कि होड़ है. जीत और होड़ में एक महीन लेकिन बड़ा बुनियादी फ़र्क़ है, जिसे या तो लोग भूल गये हैं या फिर उन्हें मालूम ही नहीं है. होड़ हमेशा दूसरों से आगे निकलने की होती है. होड़ हमेशा दूसरों से पहले कुछ पा लेने की, कुछ झटक लेने की होती है. होड़ यह नहीं देखती कि जो पाया गया, वह कैसे पाया गया? उसका एक ही नियम है कि चाहे जैसे भी, बल से या छल से जो भी हासिल कर सकते हो, कर लो. दुर्भाग्य से आज होड़ में आगे रहने को ही लोग जीत मानने लगे हैं. और जीत का मतलब यही समझा जाता है कि होड़ में दूसरों को पछाड़ो, अपनी जगह बनाओ, सही या ग़लत कैसे भी!

होड़ या तथाकथित जीत की इस अदम्य चाह को हम जीवन में जगह-जगह घटते देखते हैं, स्कूल के क्लासरूम से लेकर कारपोरेट मैनेजमेंट और टीवी के रियलिटी शो से लेकर सड़क और अपार्टमेंट की लिफ़्ट तक. कभी आपने नोटिस किया है कि लिफ़्ट में चाहे जितनी भी जगह हो, उसमें से बाहर आनेवालों का इन्तज़ार किये बिना हम क्यों लिफ़्ट में घुसने की आपाधापी में रहते हैं? क्या हम नहीं जानते कि लिफ़्ट में से कुछ लोग बाहर आयेंगे, तो भीतर हमारे लिए और जगह बनेगी? जानते तो हैं, लेकिन इसका क्या भरोसा कि उस फ़्लोर पर कुछ लोग लिफ़्ट से बाहर आयेंगे ही? अगर वे बाहर न आये तो? इसलिए पहले अन्दर घुस कर अपनी जगह सुरक्षित कर लो, फिर जिसे बाहर जाना हो जाये, जिसे अन्दर आना हो आये! अपार्टमेंट की लिफ़्ट का उदाहरण इसलिए कि आमतौर पर उसमें ऐसी भीड़ नहीं होती कि लोगों को अन्दर जगह न मिले. फिर भी हम सबसे पहले उसमें अपनी जगह बनाने की होड़ में रहते हैं. क्यों? इसलिए कि हमारा अवचेतन हमें लिफ़्ट का 'युद्ध' जीतने के लिए ठेलता है.
लेकिन न कोई हमें बताता है और न हम कभी महसूस कर पाते हैं कि जीवन के हर पल हम 'लिफ़्ट के युद्ध' जैसी जो असंख्य 'विजय' प्राप्त कर ख़ुश होते रहते हैं, क्या वाक़ई वह जीत है? क्या हमने कभी सोचा कि इस 'जीत' से क्या अच्छा हुआ? यही न कि आप दूसरों को पीछे छोड़ कर कुछ पहले लिफ़्ट में घुस गये. कुछ दूसरे लोग जो आपके मुक़ाबले ज़्यादा शिष्ट थे (या कहें कि फिसड्डी थे), आपसे कुछ पल बाद लिफ़्ट में आये. आपने वहाँ पहले पहुँच कर क्या पाया और उन्होंने कुछ पल बाद लिफ़्ट में पहुँच कर क्या खोया? गये तो सब एक ही लिफ़्ट में! चलिए पल भर को मान लें कि यह लिफ़्ट किसी अपार्टमेंट की नहीं, बल्कि एक भीड़ भरे दफ़्तर की है. हो सकता है  कि आप ठेलमठेल कर पहले लिफ़्ट में घुस गये, बाक़ियों को जगह नहीं मिली और वे अगली लिफ़्ट में आये. यहाँ भी एक-दो मिनट पहले अपने गंतव्य पर पहुँच कर आपने क्या पाया और दूसरों ने एक-दो मिनट बाद पहुँच कर क्या खोया?

यह होड़ सब जगह है. कारपोरेट कम्पनियों में किसी तरह औने-पौने मुनाफ़ा कमाने की होड़ है. जिसका सबसे बड़ा मुनाफ़ा, वह सबसे सफल कम्पनी! लेकिन अकसर यह मुनाफ़ा बढ़ाया कैसे जाता है? अकसर लागत घटा कर, घटिया कच्चा माल लगा कर, या पैकिंग में भरी गयी चीज़ का वज़न घटा कर! कुछ दिनों पहले मेरा घरेलू प्रिंटर ख़राब हो गया. कभी 7-8 साल पहले ख़रीदा था. सोच रहा था कि यह अब कबाड़ हो गया, इतना पुराना है, इस बीच तकनालाॅजी कितनी बदल चुकी है. बहरहाल, बनवाने ले गया. सर्विस सेंटर पर मेकेनिक से यों ही पूछा कि कहीं कोई एक्सचेंज आॅफ़र चल रहा है क्या? इसे बदल कर नया ले लूँ. वह फ़ौरन बोला कि जब तक यह चल रहा है, चलाते रहें. आजकल जो नये चमकीले-दमकीले माॅडल आ रहे हैं, उनमें तो कोई जान नहीं है. यही अनुभव बारह-तेरह साल पुराने माइक्रोवेव ओवन का है. मेकेनिक कहता है कि इसे बनवाते रहो और चलाते रहो. नया ख़रीदोगे तो पछताओगे! क्यों भई, आज जब तकनालाॅजी इतनी आगे बढ़ चुकी है, तो इन चीज़ों की क्वालिटी साल दर साल क्यों गिर रही है? इसीलिए कि क्वालिटी ख़राब होगी तो लागत कम होगी, मुनाफ़ा बढ़ेगा. फिर दस-बारह साल चलने के बजाय चीज़ जल्दी कबाड़ हो जायेगी और ग्राहक को अपेक्षाकृत जल्दी-जल्दी नयी चीज़ें ख़रीदनी पड़ेंगी, जिससे कम्पनी का उत्पादन बढ़ेगा और मुनाफ़ा भी. एक दिन मेरी पत्नी ने बिस्कुट का पैकेट ख़रीदा. हमेशा वही बिस्कुट घर में इस्तेमाल होता है. दाम तो वही पुराना था, पैकिंग में भी कोई अन्तर नहीं था. फिर भी उन्हें कुछ खटक रहा था. अचानक उन्होंने उसके वज़न पर नज़र डाली. वज़न कुछ ग्राम कम हो गया था. पैकेट में बिस्कुटों की संख्या उतनी ही थी, दाम भी वही, लेकिन बिस्कुटों का कुल वज़न घटा कर मुनाफ़ा बढ़ाने की चाल चली गयी. फिर चाय की पत्ती के साथ भी यही माजरा हुआ. यानी चोरी से मुनाफ़ा बढ़ा लो!
अपने हिसाब से ये कम्पनियाँ मुनाफ़े के 'टारगेट' की दौड़ में जीत रही हैं, लेकिन अरबों रुपये अपने लुभावने विज्ञापनों पर लुटा देने के बावजूद ग्राहक का दिल जीतना इनके 'टारगेट' में कहीं है ही नहीं! अब ज़रा अस्पतालों की बात कर लें. भव्य इमारतें, अत्याधुनिक उपकरण, नामी-गिरामी डाॅक्टरों की लम्बी-चौड़ी टीम, लेकिन वहाँ भी डाॅक्टरों के लिए 'टारगेट' तय है कि उन्हें हर महीने इतनी कमाई अस्पताल के लिए जुटानी होगी! वे 'टारगेट' कैसे पूरा करते हैं, वे जानें! इसलिए अब किसी भी अस्पताल पर विश्वास नहीं होता कि वह मरीज़ से जो पैसा ले रहा है और जो निदान सुझा रहा है, वह कितना सही है. अस्पताल को नाम, साख और सम्मान कमाने की फ़िक्र बिलकुल नहीं है, मुनाफ़ा दिन दूना, रात चौगुना बढ़ना चाहिए. यही हाल मीडिया का है, बाज़ारवाद और पेड न्यूज़ जैसी बुराइयों के चलते उसकी साख हाल के बरसों में लगातार गिरी है. शिक्षण संस्थान भी अन्धाधुन्ध मुनाफ़े की फ़ैक्ट्रियों में बदल चुके हैं. 

ये सब इनके अपने मुताबिक़ जीत रहे हैं. दूसरों को ठेहुनी मारते ठेलते-ढकेलते आगे तो बढ़ रहे हैं, लेकिन क्या इससे कुछ अच्छा हो रहा है? अगर अच्छा हो रहा होता तो चारों तरफ़ इतनी निराशा, इतनी नकारात्मकता क्यों होती? जीत का मूलमंत्र है कि हर जीत से प्रेरणा मिलनी चाहिए. लेकिन आज हर एक जीत  अपने पीछे हज़ारों हारे हुओं की क़तार क्यों ढो रही है? आप कहेंगे, भला इसमें क्या हैरानी? जब हज़ारों की भीड़ में किसी एक को ही जीतना है तो पराजितों की क़तार हज़ारों में ही तो होगी. बिलकुल सही कह रहे हैं आप! लेकिन ज़रा ध्यान दें. एक जीत ऐसी होती है जो हज़ारों लोगों को, और हारनेवालों तक को जीत सकने की प्रेरणा देती है, जो सिखाती है कि ऐसा कुछ नहीं है, जिसे जीता न जा सके, बस लगन हो, संकल्प हो, तैयारी हो, मेहनत हो तो दुनिया में कुछ भी जीता जा सकता है. ऐसी जीत किसी को हराती नहीं, बल्कि हारनेवालों में भी आशा का संचार करती है, अकसर उन्हें बड़ा, और बड़ा सपना देती है. और दूसरे क़िस्म की जीत वह होती है, जो अगर किसी को किसी चीज़ के लिए प्रेरित करती है, तो बस बेईमानी करने के लिए! वह हज़ारों हारनेवालों में अवसाद भरती है, 'फिसड्डी' होने की लाचारी, अविश्वास और असुरक्षा पैदा करती है. उनके करियर, जीवन, और भविष्य पर संकट खड़ा करती है. निराशा के घटाटोप को फैलाती-बढ़ाती है. अब बताइए, आपको कौन-सी जीत चाहिए?

भाई, ज़रा मिनट भर रुक कर देखें और सोचें कि जिस दौड़ में आप अपना सब कुछ दाँव पर लगा रहे हैं, वह आपको क्या देगी? आप अगर सबसे आगे हुए भी तो भी वह जीत नहीं है. वह वैसा ही है, जैसे लिफ़्ट में दूसरों से पहले घुस जाना. उससे आप पाते कुछ नहीं हैं, बस दूसरों को यह नकारात्मक एहसास कराते हैं कि सही तरीक़े से कोई आगे नहीं बढ़ सकता! ऐसी होड़ अन्ततः आत्मघाती ही होगी, इससे समाज में जो नकारात्मकता, निराशा और कुंठा उपजेगी, उसकी लपटों से आप भी अछूते नहीं रहेंगे, चाहे आप दूसरों से कितना ही आगे क्यों न निकल गये हों. इसलिए पहले समझिए कि जीत किसे कहते हैं और तब जीत के लिए निकलिए, जग जीतिए और दूसरों को प्रेरित कीजिए कि वे भी नया जग जीतें.
(लोकमत समाचार, नवम्बर 2013)


Monday, 16 September 2013

नमोरथ का मनोरथ : 2014 या उससे आगे?


हरा समंदर, गोपी चन्दर, बोल मेरी मछली कितना पानी. जुमे का दिन हो, कुरता भगवा के बजाय हरा हो और बीजेपी में एक 'हिन्दू राष्ट्रवादी' का राजतिलक हो रहा हो! है न कुछ अटपट! ममता बनर्जी भी जुमे को मुख्यमंत्री पद की शपथ लें और नरेन्द्र मोदी भी पार्टी में अपनी ताजपोशी के लिए जुमे का दिन ही चुनें, कुरता भी हरियाला हो जाए, जनसभाओं में बुर्क़ों और जालीदार गोल टोपियों की नुमाइश लगायी जाए तो बेचारी मछली को पानी की थाह तो लेनी ही पड़ेगी!

'धर्मनिरपेक्षता के बुर्क़े' से शुरू होकर अपनी सभाओं में 'ख़रीदे गये बुर्क़ों की छटा बिखेरने' तक नमोरथ को अपना मनोरथ पाने के लिए अभी न जाने क्या-क्या फट्टे-फच्चर कहाँ-कहाँ जुगाड़ने-उखाड़ने, काटने-पीटने और ठोकने-ठाकने पड़ेंगे, जाने कितने मुखौटे बदलने पड़ेंगे, जाने किस-किस रंग के कुरते पहनने पड़ेंगे! लेकिन फ़िलहाल तो सबसे बड़ा फच्चर हत्थे से उखड़ गया. पार्टी में अब कोई और 'वाणी' नहीं बची है. बस अब नमोराज है, नमोजाप है, नमोनाम है.

ठीक है कि संघ की नमो-स्थापना अन्ततः निर्विघ्न सम्पन्न हो गयी और पार्टी के सारे 'अ-सुरों' को आख़िर सुर में सुर मिला कर नमो राग गाना पड़ा. यह मजबूरी के चने थे जो सबको चबाने पड़े. लेकिन ऐसे बेढंगे चने अकसर आसानी से हज़म नहीं होते और कई बार कई-कई दिनों तक पेट में गड़ते रहते हैं. अगर हाज़मा ख़राब हो तो बहादुर से बहादुर और कुशल से कुशल सैनिक भी युद्ध क्षेत्र में तलवार के बजाय पेट ही पकड़े दिखायी देता है. इसलिए चक्रव्यूह का पहला चक्र भेद चुकने के बाद अब नमो को सबसे पहले अपनी पार्टी के कई नेताओं के बिगड़े हाज़मे की तरफ़ ध्यान देना होगा. समस्या यह है कि बीमारों की यह लाइन ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही लम्बी नज़र आ रही है. इनमें कुछ बोले बीमार हैं , जिन्हें दुनिया जानती है, तो बहुत-से अबोले बीमार भी हैं, जिन्हें कोई नहीं जानता. इतने बीमारों का इलाज कैसे होगा, यह मोदी की सबसे बड़ी चुनौती होगी. 

यानी मोदी अन्दर भी लड़ेंगे और बाहर भी. अन्दर अपनी पार्टी में और बाहर अपने चुनावी प्रतिद्वन्द्वियों से. पार्टी ऊपर से लेकर नीचे तक साफ़-साफ़ दो हिस्सों में बँटी हुई है. एक वह लोग हैं जो मोदी के साथ हैं और दूसरे वह जो महज़ फ़ोटुओं में साथ दिख रहे हैं.

मोदी के सबसे बड़े दुश्मन मोदी ही हैं. मोदी यानी उनकी छवि. वही उनकी सबसे बड़ी दुश्मन है, जो न पार्टी के भीतर उनका पीछा छोड़ती और न पार्टी के बाहर! यह बात विचित्र लगती है कि मोदी की छवि और उनका गुजरात माॅडल ही उनका सबसे बड़ा हथियार भी है और उनका सबसे बड़ा शत्रु भी. उनकी छवि के कई रूप हैं, एक जिसे वह ख़ूब बढ़-चढ़ कर और अकसर राई का पहाड़ बना कर प्रचारित करते हैं, वही विकास, गवर्नेन्स, दृढ़ नेतृत्व, त्वरित निर्णय आदि-आदि. उनकी दूसरी छवि बुलडोज़र की है. गुजरात में बीजेपी मोदी से ही शुरू होती है और मोदी पर ही ख़त्म होती है. वहाँ पार्टी के सारे दिग्गज नेताओं को वह भूतपूर्व बना चुके हैं. ऐसे में दिल्ली और दूसरे प्रदेशों में बीजेपी के दिग्गज महारथियों को मोदी का दिल्ली आक्रमण भला कैसे सुहाये? सबको पता है कि अगर मोदी अपने मिशन पीएम में कामयाब हो गये तो बीजेपी का गुजरात माॅडल देर-सबेर दिल्ली और बाक़ी इलाक़ों में भी लागू होगा और शायद भूतपूर्व वाली तख़्तियों की संख्या अभूतपूर्व ढंग से बढ़ जाए.
इसी बुलडोज़र छवि के साथ तीसरी छवि है दंगों की, मुसलमानों को 'सबक़' सिखा देनेवाले एक 'हिन्दू राष्ट्रवादी' मुख्यमंत्री की. हालाँकि मोदी ने हाल में ख़ुद ही घोषित किया कि वह 'हिन्दू राष्ट्रवादी' हैं और उनके समर्थकों ने देश भर में पोस्टर लगा कर इस एलान को गर्व से प्रचारित किया. वैसे मोदी यह न भी करते तो भी किसी को उनके 'हिन्दू राष्ट्रवादी' होने में कभी कोई सन्देह नहीं रहा, न तो उनके समर्थकों को और न ही उनके विरोधियों को. कुछ लोग हैरान हैं कि मोदी को अपने आपको नये सिरे से 'हिन्दू राष्ट्रवादी' के तौर पर स्थापित करने की ज़रूरत क्यों पड़ी? ख़ास कर तब, जब अपनी मुसलिम-विरोधी छवि की 'ड्राई क्लीनिंग' भी उनकी रणनीति के लिए ज़रूरी हो.

है न ज़बरदस्त विरोधाभास! एक तरफ़ 'हिन्दू राष्ट्रवाद' का पोस्टर ब्वाय, दूसरी तरफ़ सभाओं में बड़ी मशक़्क़त करके बुर्क़ेवालियों और टोपीवालों की मजमेबाज़ी. कोई मौक़ा ऐसा न छूटे जब कोई 'दाढ़ीवाला बन्दा' मोदी के लिए दिल न्योछावर करता नज़र न आये. और फिर ताजपोशी जुमे को हो और कुरता हरा हो! और कितने सबूत चाहिए आपको कि मोदी मुसलिम विरोधी नहीं हैं और सारे मुसलमान मोदी को ख़ारिज नहीं करते. 

मोदी को मालूम है कि उन्हें अपनी मुसलिम विरोधी छवि कितनी धोनी है. बस ज़रा-सी. या यों कहें कि धोनी नहीं, बल्कि उस पर कहीं-कहीं यह मुलम्मा चढ़ाना है कि मुसलमानों को मोदी से अब वैसा परहेज़ नहीं रहा तो अब वीसा को लेकर घिस-घिस रुके. दूसरी बात यह कि चुनाव बाद ज़रूरत हो तो कुछ नये सहयोगियों के लिए मोदी से हाथ मिलाने का, आँखों की शर्म छुपाने का कोई रत्ती भर बहाना तो हो. इसलिए मोदी 'सेकुलर' हुए बिना सावधानी से मुसलमानों का जमावड़ा भी लगाते हैं और ख़ुद को 'हिन्दू राष्ट्रवादी' भी घोषित करते हैं ताकि उनको लेकर हो रहा ध्रुवीकरण चलता और बढ़ता रहे.

अचरज की बात है कि नमोरथ की यात्रा में अड़ंगा डाल रहे बीजेपी के तमाम नेताओं का तर्क यही था कि मोदी के नाम की घोषणा से ध्रुवीकरण होगा. लेकिन शायद संघ की नयी रणनीति है कि ध्रुवीकरण हो. संघ को लगता है कि मोदी के ज़रिये अगर 2014 में निशाना लग गया तो लग गया, वरना इस बहाने वह बीजेपी का पूरा चेहरा-मोहरा बदल कर हिन्दुत्व के नये संस्करण को देश की राजनीति में उतार सकता है, जो मन्दिर आन्दोलन जैसी भदेस बैसाखियों पर न टिका हो, बल्कि विकास, कारपोरेट ग्रोथ, इंडिया स्टोरी जैसे चमकदार चाँदी वर्क में लपेटा हुआ बीड़ा हो. चुनाव तो 2014 के बाद भी आयेंगे. संघ इन्तज़ार कर लेगा. तब तक हरा समंदर, गोपी चन्दर, बोल मेरी मछली कितना पानी!
(अमर उजाला, 16 सितम्बर 2013 के अंक में प्रकाशित)
(अख़बार ने इसका शीर्षक लगाया था : छवि से बाहर निकलने की चुनौती)

Sunday, 21 July 2013

नमो के विकास का तिलिस्म

जलेबी छन रही है और दिमाग़ घूम रहा है. चाशनी विकास की है, घी 'इंडिया फ़र्स्ट' मार्का 'सेकुलरिज़्म' का है, जलेबी छाननेवाला कपड़ा 'पिछड़े' थान का है, कड़ाही सरदार पटेल छाप 'राष्ट्रीय एकता' के लोहे की है, आग हिन्दुत्व की है और हलवाई 'हिन्दू राष्ट्रवादी' है!

पिछले क़रीब साल भर से बीजेपी अपनी राजनीति का जो तिलिस्मी मंतर ढूँढ रही थी, उसकी शक्ल अब काफ़ी कुछ साफ़ होने लगी है. इसमें मुसलमानों के लिए विज़न डाक्यूमेंट भी है, और उसकी काट के लिए ' कुत्ते के पिल्ले' का मुहावरा भी है, युवाओं और कारपोरेट को रिझाने के लिए विकास का 'पाॅवर प्वाइंट प्रेज़ेंटेशन' है तो पिछड़ों के लिए 'चाय बेचनेवाले पिछड़ी जाति के एक बालक' के तमाम काले पहाड़ों को लाँघ कर 'महाविजेता' बन जाने की एक 'मर्मस्पर्शी और प्रेरणादायक' कहानी भी है. अपने परम्परागत मतदाताओं के लिए राम मन्दिर, हिन्दुत्व और अब हिन्दू राष्ट्रवाद का भगवा ध्वज भी है, चीन और पाकिस्तान को नाकों चने चबवा देने के लिए 'पटेलवाला लोहा' भी है, तो अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हामी भराने के लिए ख़ास तौर पर 'कस्टमाइज़्ड सेकुलरिज़्म' का मुखौटा भी है.

हमारे बचपन में काग़ज़ और सेलुलाइड के मामूली-से खिलौने हुआ करते थे और हम उन्हीं टटपुंजिया-से खिलौनों से ख़ुश हो लिया करते थे. मुझे याद है तब काग़ज़ का एक खिलौना हमें बड़ा जादुई-सा लगता था. वह छपा हुआ एक चित्र हुआ करता था. एक तरफ़ से देखो तो 'चोटी वाले पंडित जी' दिखते थे और उसे उलट कर देखो तो 'दाढ़ी वाले मुल्ला जी' नज़र आने लगते थे. ऐसे ही एक और खिलौना होता था, जिसमें अलग-अलग कोणों पर छोटे-छोटे दर्पण लगे होते थे और अन्दर कई रंगों की चूड़ियों के टूटे हुए टुकड़े भरे होते थे, उसे जब हिला कर देखिए, अन्दर चूड़ियों के टुकड़ों से हर बार नयी डिज़ाइन बन जाया करती थी. बीजेपी भी इस बार कुछ-कुछ ऐसा ही, कई-कई मुखों वाला 'नमो विकास तलिस्मान' गढ़ रही है. इसकी ख़ासियत यह होगी कि इसे आप जिधर-जिधर से देखेंगे, विकास अलग डिज़ाइन का, अलग रंग का, आपकी पसन्द का दिखने लगेगा!

दरअसल, बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि 2014 का चुनाव उनके लिए जाने-अनजाने ही 'अभी नहीं, तो कभी नहीं' की एक अभूतपूर्व स्थिति लेकर उपस्थित हो रहा है. ज़रा आज की तुलना कीजिए 1991- 1996 के नरसिंह राव के दौर से. राम जन्मभूमि आन्दोलन की परिणति के तौर पर 1992 में बाबरी मसजिद ध्वस्त हो चुकी थी. अयोध्या प्रकरण ही नहीं, बल्कि अपने पूरे कार्यकाल में नरसिंह राव सरकार तमाम दूसरे मुद्दों पर भी अकर्मण्यता के कारण बदनाम रही. भ्रष्टाचार के कई बड़े मामले सामने आये और ख़ुद नरसिंह राव भी भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे. काँग्रेस में राव को लेकर विरोध चरम पर पहुँच गया और अन्ततः अर्जुन सिंह और नारायणदत्त तिवारी के नेतृत्व में 1995 में विरोधियों का एक धड़े ने अलग पार्टी बना ली. सच तो यह है कि 1996 में स्थिति आज से कहीं ज़्यादा ख़राब थी. आज मनमोहन सरकार को लेकर जनता में जो नकारात्मक छवि बनी है, ठीक उन्हीं स्थितियों में तब राव सरकार दिख रही थी, लेकिन तब चुनाव के ठीक पहले काँग्रेस टूट चुकी थी और बाबरी मसजिद को गिरा देने के बाद बीजेपी का उत्साह बढ़ा हुआ था. इसके बावजूद बीजेपी कुल 161 सीटें ही जीत पायी. अटल जी तेरह दिन के प्रधानमंत्री बने और फिर देवेगौड़ा-गुजराल युग में सरकार दो साल तक घिसटी.1998 और 1999 के दोनों चुनावों में बीजेपी ने 182 सीटें जीतीं. कारण यही था कि लोग देवेगौड़ा-गुजराल युग की अधर में अटकी सरकारों से बेहतर विकल्प चाहते थे और काँग्रेस के पास उस समय कोई प्रभावी नेतृत्व नहीं था. इसलिए बीजेपी कुछ ख़ास किये बिना भी 'लाचारी' के एक विकल्प के तौर पर उभरी.

आज बीजेपी को ठीक 1996 की स्थितियाँ दिख रही हैं. सरकार की छवि ख़राब है, बिलकुल राव सरकार की तरह. काँग्रेस में 1996 जैसा संकट तो नहीं, लेकिन नेतृत्व को लेकर उहापोह है. राहुल गाँधी को आग के दरिया में झोंक दिया जाय या नहीं, यह बड़ा सवाल उसके सामने है. विकास की गति धीमी पड़ जाने, महँगाई बढ़ते जाने, हर मोर्चे पर सरकार के 'ढीले-ढाले-से' दिखनेवाले रवैये, भ्रष्टाचार समेत सभी बड़े मुद्दों प्रधानमंत्री की 'किंकर्तव्यविमूढ़ता' की स्थिति से उपजी निराशाओं के बीच बीजेपी को अगर लगता है कि वह अपने नमो ब्रह्मास्त्र से मैदान मार लेगी, तो उसकी 'हाइपोथीसिस' अपनी जगह ग़लत नहीं है.

1996 में बीजेपी के पास सिर्फ एक कुंजी थी, राम मन्दिर की. और वह तब के अनुभवों से सबक़ लेकर सिर्फ एकमुँही चाबी पर दाँव नहीं लगाना चाहती. उसे चाहिए ऐसी 'मास्टर की' जिसमें तरह-तरह के करतब भरे पड़े हों. इस बार बीजेपी कम से कम 1998-99 के 182 सीटों के आँकड़े को तो कैसे भी पाना चाहेगी. और यह आँकड़ा आयेगा कहाँ से? उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और उत्तराखंड से ही वह कुछ सीटें बढ़ा सकती है, जहाँ उसका खाता पिछले चुनाव में बहुत ख़राब था. कुछ सीटें वह मध्यप्रदेश, बिहार और गुजरात से बढ़ा लेने की रणनीति बना सकती है. बस.

इसलिए उत्तर प्रदेश का क़िला भेदने के लिए अमित शाह की तैनाती के साथ हिन्दुत्व की बाँग लगायी गयी है और नरेन्द्र मोदी ने अपने आपको 'हिन्दू राष्ट्रवादी' बता दिया है. उधर, विश्व हिन्दू परिषद ने 25 अगस्त से 13 सितम्बर तक अयोध्या में 84 कोसी परिक्रमा की घोषणा कर ही दी है. यह यूपी का गेमप्लान हुआ, जिसका लाभ राजस्थान, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश और गुजरात में मिल सकता है. लेकिन बिहार में हिन्दुत्व के बजाय नरेन्द्र मोदी के पिछड़ा होने का कार्ड खेला जायेगा तो देश के बाक़ी हिस्सों में 'नमो तलिस्मान' का जो कोण जहाँ फ़िट होगा, वहाँ उसे दिखाया जायेगा. तो अब जाकर अपने दिमाग़ की बत्ती भी जल गयी कि जो जलेबी छन रही है, उसका मतलब क्या है और अब यह भी आराम से कहा जा सकता है कि अगर नीतिश कुमार बीजेपी के साथ बने रह गये होते तो ख़ासे बेवक़ूफ़ बने होते.
(अमर उजाला के 16 जुलाई 2013 के अंक में प्रकाशित)

Monday, 20 May 2013

गुफ़ा से बाहर निकले कौन

कोई इकतीस साल पहले की बात है, महाराष्ट्र के जलगाँव की मुसलिम पंचायत ने फ़तवा दिया कि मुसलिम औरतें सिनेमा नहीं देख सकतीं. तर्क दिया गया कि सिनेमा में अश्लील बातें होती हैं, इसलिए महिलाओं को इसे नहीं देखना चाहिए. तब वहाँ की छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की एक कार्यकर्ता रज़िया पटेल ने इसके ख़िलाफ़ संघर्ष शुरू किया और आख़िर में वह जीती भी. उन दिनों मैं मुम्बई में था और पत्रकारिता में बिलकुल नया-नया था. इसी जलगाँव की स्टोरी पर काम करते हुए मैं मुम्बई के एक बड़े मौलाना से मिलने पहुँचा. ज़ाहिर है कि उनकी निगाह में पंचायत ने 'सही क़दम' उठाया था. मैंने पूछा, मौलाना सिनेमा में अश्लीलता सिर्फ औरतों के लिए ही क्यों नुक़सानदेह है, मर्दों के लिए क्यों नहीं? मौलाना ने बड़ी ईमानदारी या कहें बड़ी बेचारगी से जवाब दिया कि मर्दों को रोक पाना मुमकिन ही नहीं है. औरतें तो घर में रहती हैं, उन पर यह बंदिश आसानी से लागू की जा सकती है.

तब से अब तक दुनिया बहुत बदल चुकी है. यह अलग बात है कि मुसलिम मौलानाओं की दुनिया लगभग जस की तस है और महिलाओं के प्रति उनके दृष्टिकोण में कुछ भी बदलाव नहीं दिखता. लेकिन मुझे तो लगता है कि पिछले इकतीस बरसों में भारत में महिलाएँ हर क्षेत्र में तेज़ी से आगे तो बढ़ीं, इसके बावजूद एक सांस्कारिक जड़ता से वे बाहर नहीं आ पा रही हैं. राजनीति, करियर और पढ़ाई-लिखाई में शीर्ष पर पहुँचने के बावजूद लड़कों और लड़कियों के लिए शील और चालचलन के अलग-अलग मापदंडों के सदियों पहले जड़े गये खाँचों से वे बिलकुल भी बाहर नहीं निकल सकी हैं और गाहे-बगाहे अन्तस के गहरे कुओं में बैठी घूँघटवालियाँ अपने संस्कारों के चाबुक ख़ुद अपनी पीठ पर चला कर अब भी जैकारे करती नज़र आती हैं.

अभी ग़ाज़ियाबाद की ही घटना लें. पुलिस ने किसी लड़की को किसी लड़के साथ कार में शराब पीते पकड़ा. थाने में कुछ गरमा-गरमी भी हुई और पुलिस ने लड़की को थप्पड़ जड़ दिये. अब इस घटना पर दो महिलाओं के जो बयान आये, वह देखिए. किरन बेदी के ख़याल में 'किसी लड़की का लड़कों के साथ सार्वजनिक जगह पर शराब पीना ठीक नहीं.' यह अलग बात है कि जब इस बयान पर विवाद शुरू हुआ तो उन्होंने कहा कि उनकी बात को सही तरीक़े से नहीं पेश किया गया और उनका मानना है कि 'किसी का भी सार्वजनिक जगह पर शराब पीना उचित नहीं है.' हो सकता है कि पहले किरन जी की ज़बान फिसल गयी हो या लोगों ने उनकी बात ग़लत सुन या समझ ली हो. होने को तो बहुत कुछ हो सकता है, लेकिन असल में हुआ यही कि पहले उनके मुँह से वही बात निकली, जो संस्कारों की घुट्टी के रूप में कहीं गहरे बैठी थी. यानी 'लड़की का' ऐसा करना ठीक नहीं! लड़का करे तो करे, हालाँकि वह भी ठीक नहीं, लेकिन लड़की को तो न बाबा न, क़तई ऐसा नहीं करना चाहिए! इसी घटना पर दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह का कहना था कि बच्चे अगर कुछ ग़लत करते हैं तो माँ-बाप भी उन्हें डाँटते-चपतियाते हैं तो पुलिस ने भी बच्चा समझ कर ही लड़की को थप्पड़ लगा दिया. चलिए, हम मान लेते हैं कि बरखा जी ने नासमझी में इसे पुलिस ज़्यादती के बजाय 'पितातुल्य समझावन-बुझावन' मान लिया, लेकिन ज़रा दृश्य बदल कर देखिए. अगर शराब पीने वालों में केवल लड़के ही लड़के होते और पुलिस ने ऐसा किया होता तो तब भी क्या यह 'माँ-बाप वाली' भावना कहीं से टपकती?
16 दिसम्बर के दिल्ली बलात्कार काँड पर भोपाल में एक महिला कृषि विज्ञानी ने सवाल उठाया था कि वह लड़की 10 बजे रात में अपने ब्वायफ़्रेंड के साथ क्या कर रही थी? शीला दीक्षित, ममता बनर्जी समेत तमाम ऐसे हज़ारों उदाहरण हैं जहाँ ख़ुद बड़ी जुझारू और बड़ी जागरूक मानी जानेवाली महिलाओं की तरफ़ से ऐसे ही 'लड़की के लिए आचारसंहिता' टाइप बयान आते रहे हैं. आखिर स्वतंत्र नारी का प्रतिमान बनी घूम रही ऐसी महिलाएँ भी महिलाओं के लिए मर्यादा की वही लक्ष्मण रेखा जाने- अनजाने क्यों खींचती हैं, जो उन्हें नौकरी, करियर, घूमने-फिरने की दिखावटी आज़ादी तो देती है, लेकिन साथ में महिला होने का एक पिंजड़ा भी उनके चारों ओर बनाये रखती है. अपने मूल चरित्र में सामन्ती और पुरातनवादी हमारे समाज में पुरुष तो जब बदलेंगे और सुधरेंगे, तब की तब है, लेकिन पहले महिलाओं को इस मानसिक-साँस्कृतिक जकड़ से अपने आपको मुक्त करना होगा.
(अमर उजाला, 19 मई 2013 के अंक में प्रकाशित)

Wednesday, 24 April 2013

बलात्कार के ख़िलाफ़ चाहिए एक अभियान


दिल्ली में एक और बर्बर बलात्कार से देश हतप्रभ है. रूह कँपा देनेवाली इस घटना के बाद ग़ुस्सा, हताशा, लाचारगी का एक अजीब भाव हर तरफ़ पसर गया है. किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि बलात्कारियों के बढ़ते दुस्साहस पर लगाम कभी लग भी पायेगी या नहीं. सरकार निकम्मी है, पुलिस और न्यायिक तंत्र लुप्त हो चुका है, समाज सड़ गया है, मनुष्य होने के संस्कार मर चुके हैं या फिर ऐसा क्या है कि क़रीब-क़रीब रोज़ कहीं न कहीं से जघन्य बलात्कार और उस पर संवेदनहीन पुलिस तंत्र की निष्ठुर प्रतिक्रियाओं की दिल दहला देनेवाली कहानियाँ सुनने को मिलती हैं. 16 दिसम्बर के दिल्ली बलात्कार कांड के बाद देश भर में उपजे आक्रोश के बाद जो माहौल बना था, उससे लगा था कि शायद बलात्कार जैसे अपराध के प्रति पुलिस, प्रशासन, न्यायिक मशीनरी, सरकारों और राजनीतिक तंत्र के साथ-साथ समाज और लोगों पर ज़रूर कुछ न कुछ असर पड़ा होगा. लेकिन पिछले तीन महीनों की घटनाओं से स्पष्ट है कि केवल एक क़ानून के अलावा कहीं कुछ भी नहीं बदला.

क़ानून बदलने से क्या होगा अगर क़ानून का पालन कराने का कोई तंत्र हमारे पास न हो. और सिर्फ क़ानून बनाने से क्या होगा अगर हमारी सामूहिक राजनीतिक चेतना सड़कों पर उमड़े जनाक्रोश के तात्कालिक उफान में नहा-धो कर फिर अपनी तंद्रा के अलसाये तम्बुओं में दुबक जाय. हमें यह समझना ही पड़ेगा कि स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा एक ऐसी जटिल सामाजिक समस्या है, जिससे रातोंरात किसी जादुई चिराग़ से ख़त्म नहीं किया जा सकता. इसके लिए सामाजिक-राजनीतिक-प्रशासनिक-न्यायिक सभी मोर्चों पर पूरी ताक़त से एक साथ संगठित और दीर्घकालिक अभियान शुरू करना होगा और उन देशों के अनुभवों से सीख कर आगे बढ़ना होगा जो पुलिस और न्यायिक तंत्र के मामले में हमसे कहीं बेहतर माने जाते हैं और जिन्होंने यौन अपराधों के विरुद्ध ठोस क़दम उठाये हैं.

बात शुरू करने से पहले दुनिया के कुछ विकसित देशों की स्थिति पर नज़र डालते हैं. अमेरिका जैसे देश में भी बलात्कार के सिर्फ 12 प्रतिशत मामलों में ही अभियुक्त की गिरफ़्तारी हो पाती है और केवल 3 प्रतिशत मामलों में ही सज़ा हो पाती है. वहाँ भी बलात्कार के आधे से ज़यादा मामलों में महिलाएं पुलिस से शिकायत नहीं करतीं और केवल 46 प्रतिशत मामले ही पुलिस तक पहुँचते हैं (स्रोत: रेप, एब्यूज़ ऐंड इन्सेस्ट नेशनल नेटवर्क www.rainn.org). 'क्राइम सर्वे फ़ाॅर इंगलैंड ऐंड वेल्स 2013' के मुताबिक़ ब्रिटेन में तो बलात्कार के केवल 15 प्रतिशत मामलों में ही महिलाएं पुलिस में शिकायत दर्ज कराती हैं, केवल तीन प्रतिशत मामले अदालत तक पहुँच पाते हैं और केवल एक प्रतिशत मामलों में सज़ा हो पाती है.

ये आँकड़े बहुत चौंकानेवाले हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इनके बहाने हमारी सरकारें और पुलिस तंत्र अपने निकम्मेपन, अपनी संवेदनहीनता और जड़ता का किसी प्रकार बचाव करें. इन आँकड़ों को यहाँ देने का उद्देश्य सिर्फ यह अहसास कराना भर है कि हमारे सामने कैसी कठिन चुनौती है और उससे पार पाने के लिए हमें कितनी मुस्तैदी, कितनी आक्रामकता, कितने जुझारुपन, कितने मनोयोग के साथ कितनी लम्बी लड़ाई लड़नी होगी.

सबसे पहले पुलिस. महिलाओं के विरुद्ध होनेवाले किसी भी अपराध की जाँच एक ख़ास क़िस्म की संवेदनशीलता की माँग करती है. फिर बलात्कार तो एक ऐसा अपराध है, जहाँ पीड़ित और उसके परिजनों पर केवल शारीरिक आघात ही नहीं होता, बल्कि यह हमला उनके समूचे अस्तित्व पर होता है. लेकिन दिल्ली समेत देश भर में आम पुलिसकर्मी इन मामलों में किस तरह की बेशर्मी, कैसी अश्लील संवेदनहीनता, कैसी लिजलिजी मानसिकता और कैसे घिनौने रवैये का दिन-रात प्रदर्शन करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. दिल्ली, मुम्बई से लेकर आप शहरों-क़स्बों में किसी पुलिस थाने में पुलिसकर्मियों से दो-चार बात करके देखिए, आपको साफ़ पता चल जायेगा कि महिलाओं और उनके विरुद्ध होनेवाले अपराधों के बारे में आमतौर पर उनका नज़रिया क्या है. इसका कारण यही है कि हमारे यहाँ नीचे से ऊपर तक पुलिस के प्रशिक्षण का कोई ऐसा ढाँचा नहीं है, जो बदलते सामाजिक मूल्यों, परिवेश और चुनौतियों के सन्दर्भ में उन्हें लगातार तैयार करता रहे. दूसरी बात यह कि पदोन्नति और उनके 'परफ़ार्मेन्स अप्राइज़ल' के कुछ पारदर्शी और पूर्वनिर्धारित मानक होने चाहिए, जिससे केवल वही पुलिसकर्मी आगे बढ़ पायें, जिनके विरुद्ध लापरवाही, ढिलाई, लीपापोती या कदाचरण के आरोप न हों. इसी तरह, पुलिस के कामकाज से जुड़े तमाम दूसरे मुद्दे भी हैं, जिनमें राजनीतिक हस्तक्षेप भी एक बड़ा मुद्दा है और कुछ राज्यों में तो इस मामले में भयावह स्थिति है. पुलिस सुधारों को लेकर पिछले पता नहीं कितने बरसों से हम बातें ही बातें करते आ रहे हैं, काम हमने कुछ किया नहीं. जब तक हम पुलिस तंत्र में बुनियादी सुधारों के लिए कुछ नहीं करते, तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा. बस यह ज़रूर होगा कि कभी-कभार किसी बड़ी घटना पर हम दो-चार पुलिसवालों की बलि लेकर अपने घरों में लौट जायेंगे, अगली किसी घटना के होने तक.

दूसरी बात न्यायिक तंत्र. बलात्कार के ख़िलाफ़ कड़ा क़ानून तो बन गया, लेकिन इक्का-दुक्का फास्ट ट्रैक कोर्ट बना देने के अलावा तो न्यायिक व्यवस्था जस की तस लुँज-पुँज है. बरसों-बरस मामले घिसटते रहते हैं. जब तक मुक़दमा लटकता रहता है, पीड़ित परिवार बरसों-बरस एक अन्तहीन त्रासदी से गुज़रता रहता है. जो सज़ा अपराधी को मिलनी चाहिए, उससे कहीं बड़ा दंश पीड़ित और उसका परिवार झेलता है. बहुत बार उसके हौसले भी पस्त हो जाते हैं. न्याय के लिए कोई समयबद्ध सीमा होनी ही चाहिए कि ज़्यादा से ज्यादा दो साल के भीतर निचली अदालत को फ़ैसला सुना ही देना है और अगले दो साल के भीतर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से मामले का निबटारा हो ही जाय. तभी अपराधी को मिले दंड का कोई प्रभाव समाज पर पड़ेगा. वरना बरसों बाद कोई फ़ैसला आता है, तब तक पीढ़ियाँ बदल चुकी होती हैं, परिवार इधर से उधर चले गये होते हैं, लोग पुरानी बातों को भूल चुके होते हैं और किसी के लिए उस फ़ैसले का कोई ज़यादा मतलब नहीं रह जाता.

तीसरी बात यह कि बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा को लेकर एक व्यापक देशव्यापी जनजागरण अभियान चलाये जाने की ज़रूरत है. ख़ासतौर पर छोटी बच्चियों, लड़कियों और महिलाओं को जागरूक किया जाना चाहिए कि वे किस प्रकार भावी ख़तरे को पहचानें और ऐसी किसी भी हरकत से वे किस प्रकार अपना बचाव कर सकती हैं और उन्हें कैसे इस बारे में किसी न किसी को ज़रूर बताना चाहिए.

चौथी बात. कोई ऐसी नोडल राष्ट्रीय एजेन्सी होनी चाहिए, जो केन्द्र और राज्य सरकारों, पुलिस बल और तमाम दूसरी एजेन्सियों से तालमेल रखते हुए और बलात्कार और यौन अपराधों के बारे में कार्ययोजना बनाये, चलाये और समय-समय पर अपनी प्रगति की समीक्षा कर रणनीति तैयार करती रहे. राष्ट्रीय महिला आयोग की निगरानी में यह एजेन्सी काम कर सकती है.

पाँचवी बात. पिछले दिनों सरकार ने कहा था कि वह बलात्कारियों का एक राष्ट्रीय डेटा-बेस तैयार कर एक वेबसाइट पर उनकी तसवीरें लगायेगी. इसे जल्दी से जल्दी लाया जाना चाहिए और तमाम मनचलों और यौन अपराधियों को यहाँ सुशोभित किया जाना चाहिए. इन आरोपों का ब्योरा उनके आधार कार्ड और नागरिक पंजीकरण रजिस्टर से भी जोड़ा जाना चाहिए ताकि एक बार लगा दाग़ कभी धुल न पाये.
(दैनिक हिन्दुस्तान, 24 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित आलेख का मूल पाठ)

Wednesday, 10 April 2013

पाकिस्तान में ख़तरे की नयी घंटी

पाकिस्तान में ख़तरे की नयी घंटी बजी है. और हो सकता है कि अगले बीस-तीस बरसों में यह हमारे लिए अब तक की सबसे ख़तरनाक और सबसे जटिल चुनौती साबित हो. पाकिस्तान एक जवान देश है, उसकी कुल आबादी में दो-तिहाई हिस्सा उन लोगों का है, जिनकी उम्र अभी तीस साल से कम है. लेकिन बुरी ख़बर यह है कि इन नौजवानों में से 94 प्रतिशत युवा अपने देश की मौजूदा हालत से बेहद निराश हैं और मानते हैं कि उनका देश ग़लत दिशा में जा रहा हैं. यही नहीं, पाकिस्तान के क़रीब 70 प्रतिशत युवा अपने आपको धार्मिक पुरातनपंथी घोषित करते हैं और मानते हैं कि विदेशी विचार, संगीत, फ़िल्म और विदेशी मीडिया के 'कुप्रभाव' से युवा पीढ़ी को दूर रखा जाना चाहिए. इनमें से क़रीब 38 प्रतिशत युवा देश में शरीयत के शासन के समर्थक हैं, जबकि 32 प्रतिशत को लगता है कि सैनिक शासन ज़्यादा बेहतर विकल्प है. लोकतंत्र का समर्थन करनेवाले युवाओं की संख्या सिर्फ 29 प्रतिशत है. साफ़ ज़ाहिर है कि पाकिस्तान की आबादी का दो-तिहाई हिस्सा, उसका आम नौजवान प्रगतिशील विचारों, आधुनिक और उदार जीवन शैली, लोकताँत्रिक मूल्यों से कोसों दूर एक ऐसे प्रतिगामी, धर्मान्ध, सामन्ती और रूढ़िवादी वातावरण में जी रहा है, जो एक भयावह भविष्य की ओर ही संकेत करता है. इस युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा शहरी मध्य वर्ग से आता है और चिन्ता की बात है कि उसकी सोच भी ज़्यादा अलग नहीं है.

ये चौंकानेवाले निष्कर्ष अभी हाल में ब्रिटिश काउंसिल की 'नेक्स्ट जेनरेशन रिपोर्ट 2013' में सामने आये हैं. ब्रिटिश काउंसिल ने पाकिस्तान के सभी प्राँतों में शहरी और ग्रामीण युवकों और युवतियों के बीच ऐसे सर्वेक्षण की शुरुआत चार साल पहले की थी और 2009 में अपनी पहली रिपोर्ट जारी की थी. चिन्ता की बात यह है कि इन चार वर्षों में पाकिस्तानी युवाओं में आर्थिक मोर्चे पर निराशा और धार्मिक संस्थाओं के प्रति उनके समर्थन में काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई है. 2009 में केवल 50 प्रतिशत युवा मानते थे कि धार्मिक संस्थाएँ समाज में अपनी सही भूमिका निभा रही हैं, जबकि आज 74 प्रतिशत नौजवान धार्मिक संस्थाओं की भूमिका को सही मानते हैं. इसी तरह, चार साल पहले जहाँ 63 प्रतिशत युवा सेना को सम्मान की दृष्टि से देखते थे, वहीं आज 77 प्रतिशत युवा सेना की साख को अच्छा मानते हैं.

अपने जन्म के बाद से ही सेना, धार्मिक तंत्र और राजनीतिक षड्यंत्रों के कुचक्र में फँसा पाकिस्तान हमेशा से ही लोकतंत्र और उदारवादी सुधारों के लिए एक अंधी सुरंग रहा है. धार्मिक कट्टरता, जिहादी आतंकवाद और तालिबानी सोच की गिरफ़्त में जकड़े इस देश में पहली बार यह चमत्कार हुआ कि तमाम लड़खड़ाहटों के बावजूद किसी चुनी हुई सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया. ऊपर से देखने पर तो थोड़ी उम्मीद दिखती है कि जैसी भी सही, शायद अब बदलाव की शुरुआत हो चली है और लोकतंत्र का पौधा धीरे-धीरे बड़ा और मज़बूत होगा और उसके साथ-साथ दक़ियानूसी सोच की जगह पाकिस्तानी समाज में आधुनिक और प्रगतिशील विमर्श को धीरे-धीरे ही सही, लेकिन जगह मिलने लगेगी.

लेकिन वहाँ की नयी पीढ़ी की ताज़ा रिपोर्ट तो इसके बिलकुल उलट एक बेहद भयावह तसवीर पेश करती है. निष्कर्ष बिलकुल साफ़ है कि लोकतंत्र की विफलता और आर्थिक अँधियारे ने पाकिस्तान की पूरी युवा आबादी को एक ऐसी राह पर डाल दिया है, जिसकी दिशा को मोड़ पाने के लिए अभूतपूर्व राजनीतिक संकल्प और इच्छाशक्ति की ज़रूरत होगी, जिसका फ़िलहाल वहाँ कोई अता-पता नहीं दिखता. केवल दस प्रतिशत पाकिस्तानी युवा ही पूर्णकालिक रोज़गार में हैं, क़रीब एक-तिहाई युवा कुछ छोटा-मोटा काम या दैनिक मेहनत-मज़दूरी करते हैं और युवाओं की आधी आबादी बेरोज़गार है, जिनमें लड़कियों की भारी संख्या है, क्योंकि विवाहित-अविवाहित युवा लड़कियों में क़रीब 86 प्रतिशत घर की चहारदीवारी में ही रहती हैं और जो भविष्य में भी घर के भीतर ही रहेंगी. इनमें से सत्तर प्रतिशत लड़कियाँ घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. केवल दस प्रतिशत युवा ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें से ज़्यादातर शहरी लड़के हैं.

यह सारी बातें इसलिए बहुत गम्भीर हो जाती हैं कि इतने गहरे धार्मिक आग्रहों और पुरातनपंथी सामाजिक संरचना में जकड़े वहाँ के युवाओं के सामने अच्छे आर्थिक अवसर न के बराबर हैं, दूसरे इनके पास ऐसी कोई खिड़की नहीं है, जिससे नये विचारों की उजास मिल सके, तीसरी बात यह कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से न तो युवाओं को कोई आशा है और न ही ऐसा लगता है कि इस साल मई में होनेवाले आम चुनावों के बाद कोई ऐसी सरकार आयेगी, जो इस युवा-शक्ति की ऊर्जा को सही दिशा दे सकेगी या देना चाहेगी. ख़ास तौर से तब, जबकि धारा 62 और 63 के तहत इन चुनावों में नामांकन पत्रों की जाँच इस आधार पर भी की जा रही है कि उम्मीदवार नमाज़ी है या नहीं और वह इसलाम के धार्मिक नियमों-कर्तव्यों का पालन करता है या नहीं. राजनीतिक कार्यकलाप पर धर्म के इस अवाँछित वर्चस्व की प्रयोगशाला से जो भी सरकारनुमा चीज़ निकल कर बाहर आयेगी, वह कितने खुले ख़यालों और सुधारों की पक्षधर होगी, यह बात आसानी से समझी जा सकती है.

इसी सन्दर्भ में अभी एक और ताज़ा रिपोर्ट सामने आयी है. 'वेस्ट प्वाइंट' ने पाकिस्तान के कुख्यात आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा के नौ सौ मारे जा चुके आतंकवादियों के जीवन वृत्त का अध्य्यन कर कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण तथ्य पेश किये हैं. इसके अनुसार आमतौर पर 16 साल की उम्र में एक युवा लश्कर में भर्ती होता है और 21 साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते वह किसी न किसी आॅपरेशन में मार दिया जाता है. चौंकानेवाली बात यह है कि इनमें से क़रीब आधे आतंकवादियों की पढ़ाई मदरसों के बजाय सामान्य स्कूलों में हुई होती है और इनके परिवार इन्हें ख़ुशी-ख़ुशी आतंकवादी बनने और 'जिहाद में शहीद होने' के लिए भेजते हैं.
धर्मांन्धता के ऐसे पर्यावरण में जहाँ लश्कर जैसे संगठनों को इस प्रकार की सामाजिक स्वीकृति मिली हुई हो, जहाँ के एक बड़े भूभाग पर तालिबानियों की हुकूमत चलती हो, जहाँ ईशनिन्दा क़ानून के कुछ प्रावधानों की आलोचना करने के कारण पंजाब प्राँत के गवर्नर सलमान तासीर और धार्मिक अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज़ भट्टी की सरेआम हत्या हो जाय और लोग हत्यारों का सम्मान करें, वहाँ की नौजवान आबादी की ताज़ा तसवीर सचमुच बहुत डरावने संकेत देती है. भारत के लिए चिन्ता की बात यह है कि अगर पाकिस्तान में ज़मीनी स्थितियाँ तेज़ी से न सुधरीं (जिसके कोई आसार फ़िलहाल नहीं दिखते), तो अगले बीस वर्षों में वहाँ से निर्यात किया जानेवाला आतंकवाद हमारे लिए बहुत बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है, क्योंकि आर्थिक अंधी गली में फँसी हताश-निराश युवा ऊर्जा को धार्मिक उन्माद का मद बड़ी आसानी से अपना शिकार बना लेता है.
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(दैनिक हिन्दुस्तान, 10 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित)

Tuesday, 9 April 2013

तीन तेरह में चौदह का गणित

पल-छिन, पल-छिन, धक-धक, धुक-धुक! नमो-नमो, नको-नको! रथों के रथी क्यों नहीं? रागा-रागा कि मसि-मसि? दिल्ली की राजनीतिक चौपड़ पर हर दिन नया थियेटर चालू आहे. तेरह के कैलेंडर की तारीख़ें जैसे-जैसे चौदह की तरफ़ बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे नये-नये गुल और गुलफ़ाम सामने आ रहे हैं. आडवाणी जी को अचानक राममनोहर लोहिया अच्छे लगने लगे तो 'मौलाना' मुलायम को श्यामाप्रसाद मुखर्जी सुहाने नज़र आने लगे.
अजीब चकरघिन्नी है भाई!
ऐसा लगता है कि तेरह के इस साल ने सबका तीन-तेरह कर दिया है. मुलायम नये-नये मंतर ढूँढ रहे हैं, काँग्रेस अकबकायी हुई है. नीतिश अपने पाँसे टटोल रहे हैं तो बीजेपी अपने ही तीरों से घायल दिख रही है. अगले चुनावों जैसा अबूझ चुनाव शायद ही देश में कभी हुआ हो.
बीजेपी में घमासान इस पर है कि पार्टी में किस 'लाल' की गोटी लाल हो? नमो भाई यानी गुजरात की धरती के तीसरे लाल (जैसा कि राजनाथ जी बता गये कि गुजरात की धरती से सरदार पटेल न उठ खड़े हुए होते तो भारत आज 'अखंड' न होता और गुजरात की धरती के दूसरे लाल महात्मा गाँधी के सपनों का भारत बनाने के लिए गुजरात की धरती के एक और लाल, नमो भाई नरेन्द्र मोदी को ही देश का क़र्ज उतारना है) की लाली बीजेपी के कई महारथियों को क़तई रास नहीं आ रही है. इन सभी महारथियों के रथी और छह-छह रथ-यात्राओं की जुगाली कर रहे लालकृष्ण आडवाणी मुलायम और लोहिया के क़सीदे पढ़ते हुए अचानक अयोध्या कांड का पाठ करने लग गये! क्योंकि अगर मोदी आ गये तो फिर इन महारथियों की औक़ात इतनी भी नहीं रह जायगी कि वे मोदी के रथ में पहियों की तरह भी काम आ सकें.
उधर, युवराज राग गा रहे काँग्रेसी अचानक अचकचा गये हैं कि 'रागा' यानी राहुल गाँधी की तान ठीक रहेगी या 'मसि' यानी मनमोहन सिंह की लिखी कहानी का ही तीसरा संस्करण छापने की जुगत भिड़ायी जाय. हाथ वालों को वह हाथ नहीं सूझ रहा है, जिसे थाम कर वे चुनावी वैतरणी की तरफ़ बढ़ें? इत्ती दुविधा क्यों है बन्धु?
बीजेपी और आरएसएस को तो कोई दुविधा अब तक नहीं थी. उन्हें तो लग रहा था कि इस बार मोदी के 'सुदर्शन चक्र' से वे मैदान मार लेंगे. और सच कहें तो बीजेपी और संघ के पास मोदी से बेहतर कोई और पत्ता है ही नहीं. सब जानते हैं कि मोदी की तमाम सीमाएँ हैं, अंतर्राष्ट्रीय मंचों से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक, तरह-तरह के सवाल हैं. ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन की तरफ़ से तो दरवाज़े खुल गये, लेकिन अभी बहुत-कुछ बाक़ी है. अमेरिका का रुख़ नरम पड़ भी जाय तो अरब देशों के साथ सम्बन्ध कैसे होंगे, इसका कोई संकेत अब तक नहीं मिला है. राष्ट्रीय राजनीति में भी सवाल बने ही हुए थे. नीतिश कुमार तो पहले से ही लाल झंडी दिखा रहे हैं, लेकिन चुनावों के बाद अगर सहयोगियों की ज़रूरत पड़ी (जोकि पड़ेगी ही), तो नये सहयोगी कहाँ से आयेंगे. एक जयललिता को मोदी अपने पाले में गिन सकते हैं, लेकिन क्या ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, जगन रेड्डी या चन्द्रबाबू नायडू, मुलायम या मायावती में से कोई मोदी का कमल खिलाने को तैयार होगा? ये सारे सवाल थे, इसके बावजूद संघ अगर मोदी को अपना 'ब्रह्मास्त्र' मान रहा था, तो वह कुछ भी ग़लत नहीं सोच रहा था. मोदी के अलावा आज बीजेपी के पास ऐसा कौन-सा नेता है, जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ कर पार्टी उम्मीद कर सके कि कम से कम वह इतनी सीटें तो जीत सके, जितनी इस लोकसभा में उसके पास हैं.
यही कारण है कि तमाम असहजताओं के बावजूद संघ के लिए मजबूरी का नाम मोदी है. मोदी के पास कम से कम तीन बड़े हथियार हैं, जिनसे संघ को बड़ी उम्मीदें हैं. पहला विकास, दूसरा हिन्दुत्व की अन्तर्निहित छवि (जिसके लिए मोदी को किसी नये हिन्दुत्ववादी नारे की ज़रूरत नहीं है) और तीसरा 'दबंग' नेता के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकनेवाला व्यक्तित्व. यहाँ तक तो सब ठीक था, लेकिन पार्टी के बाक़ी नेताओं को जो बात पच नहीं रही है, वह है मोदी का 'मैं' और 'मेरे सिवा कोई नहीं.' मोदी पिछले दस सालों से गुजरात में बीजेपी और संघ को जेब में रख कर टहलते रहे हैं. किसी को उन्होंने कभी कुछ नहीं समझा. पार्टी का जो भी नेता कभी गुजरात गया, वह मोदी की दया पर ही वहाँ रहा. ऐसे में मोदी अगर राष्ट्रीय राजनीति में आते हैं तो सबको डर है कि वह बाक़ी दिग्गजों को एक-एक कर ठिकाने लगा देंगे और यह डर बेबुनियाद भी नहीं. जैसे-जैसे पार्टी के बाक़ी नेताओं को इस 'ख़तरे' का एहसास होता गया, वैसे-वैसे मोदी के दिल्ली कूच को रोकने की कोशिशें शुरू हो गयीं. और अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि संघ, बीजेपी और मोदी इस नयी चुनौती से कैसे निपटें? इस बात की क्या गारंटी है कि मोदी के नेतृत्व में अगर चुनाव लड़ा गया तो पार्टी में बड़े पैमाने पर अन्तर्घात नहीं होगा? अब बीजेपी की सबसे बड़ी धुकधुकी यही है.
उधर, काँग्रेस में भी सम्भवतः सहसा ही कोई आत्मबोध हुआ लगता है कि चुनावी शतरंज में ' रागा' यानी राहुल गाँधी को राजा की तरह उतारा जाय या नहीं? अगर उन्हें भविष्य के प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करते हुए काँग्रेस चुनाव लड़ती है तो इससे दो बड़े ख़तरे हैं. पहला यह कि लड़ाई मोदी बनाम राहुल हो सकती है, जो नाक की लड़ाई बन सकती है. दूसरा यह कि नतीजे अगर कहीं बिहार और उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावों की तरह ही ख़राब आ गये तो युवराज की बड़ी छीछालेदर होगी. इसलिए मजबूरी का नाम 'मसि' यानी फ़िलहाल मनमोहन सिंह की पर्ची लेकर चलिए, आगे की बात चुनाव बाद देखी जायगी! राहुल या मनमोहन सिंह-- काँग्रेस की धुकधुकी यही है. और मुलायम और नीतिश टकटकी लगाये देख रहे हैं, आगे-आगे होता है क्या?
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(अमर उजाला, 9 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित)

Sunday, 24 February 2013

अटपटी सम्भावनाओं के स्वप्न!




"आख़िर मौलाना महमूद मदनी अचानक ऐसी 'अटपटी' सम्भावनाओं का स्वप्न क्यों बुनने लग गये कि 2014 आते-आते मुसलमानों को बीजेपी और मोदी अच्छे भी लगने लग सकते हैं!"




हुज़ूर मदनी साहब, आख़िर माजरा क्या है? क़यास पर क़यास लग रहे हैं. लोग अपनी-अपनी अक़्ल के घोड़े दौड़ा कर पता करने में लगे हैं. बीजेपी ख़ुश है! माफ़ कीजिएगा, मुझे अचानक 'रंगा ख़ुश' याद आ गया! बेचारी सेकुलर पार्टियों का तो मुँह ही उतर गया. सारे देश के मुल्ला-मौलवियों की नींद अचानक टूट गयी. दारुल उलूम देवबन्द जैसी संस्था से जुड़े और जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के महासचिव मौलाना महमूद मदनी का दिल अगर नरेन्द्र मोदी को लेकर पसीजने लगे तो धमाका तो होगा ही.
वैसे मदनी साहब का कहना है कि उन्होंने अपने इंटरव्यू में तो सिर्फ ज़मीनी हक़ीक़त का ज़िक्र किया था कि गुजरात में बहुत-से मुसलमानों ने इस बार मोदी को वोट दिया. बिहार में भी नीतिश कुमार के कारण कई जगहों पर मुसलमानों ने  बीजेपी को वोट दिया है. यानी "बड़ा चेंज आ रहा है, सिचुएशन चेंज हो रही है और यक़ीनन गुजरात के लोग (मुसलमान) अलग तरीक़े से सोच रहे हैं." हालाँकि वह आगे साफ़ करते हैं कि ज़रूरी नहीं कि जो कुछ गुजरात और बिहार में घटित हो रहा है, उसका प्रतिबिम्ब पूरे देश में दिखे, लेकिन उन्होंने एक बेहद महत्त्वपूर्ण बात कही, जिसकी तरफ़ शायद लोगों का ध्यान नहीं गया. उन्होंने कहा, "2002 की दुर्घटना को जितने गर्व के साथ वह (मोदी) लेते आये हैं, वह इसमें सबसे बड़ी रुकावट है कि हम कह दें कि सब ठीक है." जब उनसे पूछा गया कि अब तो मोदी उन सब बातों की कोई चर्चा नहीं करते और सिर्फ विकास की बात करते हैं तो मदनी साहब का जवाब था,"कुछ अफ़सोस (गुजरात दंगों पर) होना चाहिए था. विकास इन्साफ़ के बग़ैर कैसे होगा?" और मदनी ने यह भी साफ़ किया कि उनकी नज़र में सेकुलर पार्टियाँ मोदी या बीजेपी से बेहतर नहीं हैं!
इसका क्या मतलब निकाला जाय? आख़िर मौलाना महमूद मदनी अचानक ऐसी 'अटपटी' सम्भावनाओं का स्वप्न क्यों बुनने लग गये कि 2014 आते-आते मुसलमानों को बीजेपी और मोदी अच्छे भी लगने लग सकते हैं! और सेकुलर पार्टियों से मौलाना का मोहभंग अभी ही क्यों हुआ? क्या सचमुच मुसलमान सेकुलर पार्टियों से निराश हो चुके हैं और उन्हें नये ठिकाने की तलाश है? या फिर सचमुच मौलाना मोदी को 'विकासपुरुष' मानने लगे हैं और उन्हें लगता है कि अगर मोदी वाक़ई प्रधानमंत्री बनने ही वाले हैं तो फिर देश के मुसलमान अपने गुजराती भाइयों से सीखते हुए क्यों न मोदी से दोस्ती के रिश्ते क़ायम करें! हो सकता है कि मौलाना को लगा हो कि अगर यूरोपियन यूनियन इतने बरसों के बाद मोदी से फिर संवाद शुरू करता है तो मुसलमान भी अगर अपना नज़रिया बदलने के बारे में सोचें तो पहाड़ थोड़े ही टूट पड़ेगा. आख़िर बिहार और गुजरात के उदाहरण सामने हैं!
पूरे इंटरव्यू में मौलाना मदनी ने एक बार भी नहीं कहा कि मोदी को माफ़ी माँगनी चाहिए. शायद उन्हें मालूम है कि मोदी क़तई माफ़ी नहीं माँगेंगे, इसीलिए वह कहते हैं कि मोदी को दंगों पर अफ़सोस जताना चाहिए. यह सब बहुत चौंकाने वाला है, ख़ासकर तब जब यह शिग़ूफ़ा उस देवबन्द से आया हो, जिसने अभी डेढ़ साल पहले ही मोदी की तारीफ़ करने के आरोप में अपने गुजराती कुलपति मौलाना ग़ुलाम वस्तानवी को बरख़ास्त कर दिया था और उनकी बरख़ास्तगी में मौलाना महमूद मदनी का बड़ा हाथ था. तब से अब तक स्थिति में सिर्फ एक बदलाव हुआ है, वह यह कि बहुत-से लोगों को लगने लगा है कि मोदी प्रधानमंत्री पद के तगड़े दावेदार हैं और अगर कहीं बाज़ी मोदी के हाथ लग ही गयी तो ऐसे में उनकी गोटियाँ सही जगह होनी चाहिए.
बहरहाल, मदनी साहब की दिली ख़्वाहिश क्या है, वही जानें. यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है. हम तो इस शिगूफ़े को खुरच-खुरच कर देखना चाहते हैं कि इसका मक़सद आख़िर क्या हो सकता है? मदनी के इंटरव्यू पर जिस तरह दनादन मुसलिम धर्मगुरुओं की तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आयीं, उसे देख कर तो नहीं लगता कि मोदी के मामले में आम मुसलमानों के मन में अगले साल-डेढ़ साल में कोई नरमी आयेगी. गुजरात का मुसलमान विकल्पहीनता की जिस लाचारी के तले घुट-घुट कर जीने को अभिशप्त है, वैसी कोई स्थिति देश भर में कहीं भी मुसलमानों के सामने नहीं है. उनके सामने विकल्प ही विकल्प हैं. पिछले कई चुनावों को देखें तो मुसलिम वोटों में एक ख़ास तरह का पैटर्न दिखता है, वह है वोटों के नितान्त स्थानीय ध्रुवीकरण का, यानी जिस चुनाव क्षेत्र में जो उम्मीदवार बीजेपी को हराने में सबसे ज़्यादा सक्षम हो, उसे वोट दिया जाय. मुझे लगता है कि इस बार यह ध्रुवीकरण पहले से और भी ज़्यादा मज़बूती से होगा.
तो फिर यह शिगूफ़ा क्यों? मोदी भी जानते हैं और मदनी भी कि हमेशा से बीजेपी के विरुद्ध रहे मुसलिम वोटर को ऐसे रातोंरात बहलाया नहीं जा सकता. लेकिन इस तरह की बातें अगर हवा में तैरती रहें तो मोदी को दो बड़े फ़ायदे होंगे. पहला यह कि मुसलमानों में उनके समर्थक कुछ ऐसे प्रभावशाली प्रवक्ता निकल आयेंगे, जो आम मुसलमानों के बीच धीरे-धीरे यह सन्देश फैलाते रहें कि मोदी से दुश्मनी पालने में नुक़सान ही नुक़सान है. न गुज़रा हुआ समय वापस लाया जा सकता है और न ही पहले हो चुके नुक़सान की भरपाई हो सकती है. भलाई इसी में है कि मुसलमान पिछली बातों को भूल कर विकास की गाड़ी में सवार हो लें. ऐसे प्रचार से मुसलमानों के विरोध की धार कुन्द होती जायेगी. दूसरा फ़ायदा यह होगा कि मोदी एक तरफ़ तो दुनिया को यह दिखाने में कामयाब हो जायेंगे कि मुसलमानों में भी उनकी स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है और दूसरी तरफ़ वह 'सेकुलर माइंडसेट' वाले हिन्दू वोटरों के बीच भी अपनी धुली-पुँछी छवि के साथ विकास के अपने झुनझुने की अपील बढ़ा पायेंगे.
मोदी युद्धकला के सिद्धहस्त खिलाड़ी हैं, प्रचार युद्ध में उनका कोई जवाब नहीं, 'इमेज वाॅर' की बारीकियों को उनसे बेहतर भला और कौन समझता है, इसका सबूत वह पिछले विधानसभा चुनाव में और अभी यूरोपियन यूनियन के मामले में दे चुके हैं. यह नया शिगूफ़ा भी उसी की एक कड़ी है. अभी-अभी अपनी रणनीति में भी उन्होंने व्यापक बदलाव किया है और महाकुम्भ में मथी गयी 'हिन्दू लहर' पर सवार होने के बजाय फ़िलहाल 'इन्क्लूसिव डेवलपमेंट' के मुखौटे को पहनने का फ़ैसला किया है.

(दैनिक हिन्दुस्तान, 22 फ़रवरी 2013)



Sunday, 17 February 2013

कब तक चलेगी ये वोटखेंचू राजनीति?




"जो लोग ये मानते हैं कि सरकार की आर्थिक नीतियाँ 'जन-विरोधी' और ' ग़रीब- विरोधी' हैं, उन्हें 'बन्द' के हल्ले-ग़ुल्ले', 'थर्ड फ़्रंट की तिकड़म' और सरकार के लिए संकट खड़ा करने के बजाय क्या आर्थिक नीति का कोई वैकल्पिक माॅडल देश के सामने नहीं रखना चाहिए था ताकि देश की जनता यह तय कर सके कि उसके लिए कौन-सा रास्ता सही है."



 पिछले एक हफ़्ते से चल रही राजनीतिक नौटंकी आख़िर ख़त्म हो गयी. उन क़यासबाज़ों को सचमुच बड़ी निराशा हुई होगी, जो सरकार के गिरने और मध्यावधि चुनाव की अटकलें लगा-लगा कर अपने फेफड़े थका रहे थे. तृणमूल काँग्रेस के हट जाने के बावजूद अब ये तय है कि सरकार नहीं गिरेगी, कम से कम तब तक, जब तक मायावती और मुलायम में से कोई एक यूपीए के साथ बना रहता है. फ़िलहाल तो दोनों की जुगलबन्दी सरकार के साथ चल रही है.

सवाल एक सरकार के बने रहने या बने रहने का नहीं है. एक सरकार जायेगी तो दूसरी आयेगी. दरअसल, ये असली सवाल एक बार फिर हमारे सामने मुँह बाये खड़ा है कि हमारी राजनीति का मक़सद आख़िर क्या है?आख़िर गाल बजाने की ये 'हा-हा, हू-हू' की वोटखेंचू राजनीति हमारे देश में कब तक चलेगी?

इसमें कोई शक नहीं कि महँगाई, सब्सिडी और विदेशी निवेश का सवाल भारत जैसी अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए एक बड़ा ही महत्वपूर्ण और गम्भीर आर्थिक मुद्दा है और विश्व अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति को देखते हुए तो यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि तमाम राजनीतिक दल इस पर ईमानदारी से अपना रुख सामने रखें, कि इस पर टुच्ची राजनीति की जाये, जो दुर्भाग्य से हमारे यहाँ हर बार होती है और इस बार भी हुई. पुर्तगाल, स्पेन और ग्रीस समेत दुनिया के कुछ देश जिस तरह के गम्भीर आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं, उसे देखते हुए क्या यह ज़रूरी नहीं कि ऐसे गम्भीर आर्थिक सवालों पर बात करते समय अपनी पार्टी के राजनीतिक भविष्य के बजाय देश के भविष्य को तरजीह दी जाये?

जो लोग ये मानते हैं कि सरकार की आर्थिक नीतियाँ 'जन-विरोधी' और ' ग़रीब- विरोधी' हैं, उन्हें 'बन्द' के हल्ले-ग़ुल्ले', 'थर्ड फ़्रंट की तिकड़म' और सरकार के लिए संकट खड़ा करने के बजाय क्या आर्थिक नीति का कोई वैकल्पिक माॅडल देश के सामने नहीं रखना चाहिए था ताकि देश की जनता यह तय कर सके कि उसके लिए कौन-सा रास्ता सही है. बीजेपी हो या लेफ़्ट, ममता हों या मुलायम या मायावती या करुणानिधि या चन्द्रबाबू नायडू या और भी वे सारे दल, जो सरकार की नीतियों का विरोध कर रहे हैं, क्यों उनमें से किसी एक ने भी देश के सामने ऐसा कोई आर्थिक चार्टर नहीं रखा कि अगर मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियाँ ग़लत हैं तो देश को अगले दस सालों के लिए ऐसा कौन-सा रास्ता चुनना चाहिए जो देश के आर्थिक विकास के लिए सही होगा, जिससे महँगाई घटेगी, ग़रीबों को राहत मिलेगी, वित्तीय घाटा क़ाबू में आयेगा, निवेश बढ़ेगा और विकास दर बढ़ेगी. पर किसी भी राजनीतिक दल ने शब्दों की बाजीगरी और अपनी राजनीतिक गोटियाँ साधने के अलावा कुछ नहीं किया!

अब बीजेपी को ही लीजिए. पार्टी लम्बे समय तक रिटेल में एफ़डीआइ की पक्षधर रही है. एनडीए सरकार के दौरान 2000 में विभिन्न सेक्टरों में विदेशी निवेश पर नीति-निर्धारण के लिए एक मंत्रिमंडलीय समूह गठित किया गया था. सन 2002 में समूह के विचारार्थ एक नोट तैयार किया गया, जिसमें रिटेल में सौ प्रतिशत तक एफ़डीआइ निवेश की ज़ोरदार पैरवी की गयी थी. यह अलग बात है कि इस पर बात तब ज़यादा आगे नहीं बढ़ी. बाद में 2004 में एनडीए के चुनावी घोषणापत्र में भी रिटेल में 26 प्रतिशत एफ़डीआइ की बात कही गयी. बीजेपी का कहना है कि 2009 के चुनावी घोषणापत्र में उसने अपने रुख़ में परिवर्तन कर लिया और उसके बाद से वह रिटेल में एफ़डीआइ के सख़्त विरुद्ध है. एक ज़िम्मेदार राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते बीजेपी को स्पष्ट करना चाहिए था कि एफ़डीआइ का दरवाज़ा खोलने वाले दुनिया के किन देशों के नकारात्मक अनुभवों के कारण उसने अन्ततः अपना रुख़ बदला? इस बदलाव के पीछे व्यापारी वोटों के खोने की चिन्ता है या सचमुच कोई ठोस आर्थिक कारण? आपको शायद याद होगा कि अगस्त 2007 में मायावती ने व्यापारियों के विरोध के चलते उत्तर प्रदेश में रिलायंस रिटेल को काम करने से रोक दिया था. बीजेपी के 'हृदय-परिवर्तन' के पीछे मायावती से मिली सीख है या और कुछ? क्योंकि खुदरा व्यापारी बीजेपी के काफ़ी बड़े वोट बैंक हैं.

और अब बात दीदी की. अगर वह डीज़ल और एलपीजी पर से सब्सिडी कम करने के फैसले का विरोध कर रही थीं, तो यह बात समझ में आती है क्योंकि पश्चिम बंगाल में उनके मतदाताओं के एक बहुत बड़े वर्ग पर यह मार पड़ रही थी. लेकिन रिटेल में एफ़डीआइ पर वह क्यों इतनी बिफरीं? वह अपने राज्य में इसे लागू करतीं. पर ममता की कुछ मजबूरियाँ थीं. पश्चिम बंगाल में उनके सामने है लेफ़्ट फ़्रंट. उन्हें अपनी इमेज कम से कम ऐसी तो रखनी ही है कि वह लेफ़्ट के मुक़ाबले ग़रीबों की ज़्यादा बड़ी मसीहा लगें. लेफ़्ट जिस मुद्दे के विरोध में इतना मुखर हो कर खड़ा हो, ममता उस पर नरम होने का जोखिम कैसे ले सकतीं थीं? इसलिए लेफ़्ट से भी ज़्यादा 'लेफ़्ट' दिखना उनके लिए फ़ायदे का सौदा था. फिर 'जुमा' पढ़ने के बाद समर्थन वापस लेना है, ताकि मुसलमान भी बिछ जायें उनकी इस अदा पर. तो दीदी, क्या ये सिर्फ़ विरोध था या वोटों की राजनीति?

अब मुलायम सिंह को देखिए. वह एक दिन पहले 'भारत बन्द' की अगुआई करते हैं, 'थर्ड फ़्रंट के मुखिया' के तौर पर पेश किये जाते हैं और अगले ही दिन घोषणा कर देते हैं कि एफ़डीआइ और सब्सिडी घटाने के धुर विरोधी होने के बावजूद 'साम्प्रदायिक ताक़तों' को सत्ता में आने देने के लिए वह मनमोहन सरकार को नहीं गिरने देंगे. क्या कहने इस मासूमियत के!

मायावती जी भी ग़रीबों की बहुत बड़ी हितैषी हैं और सरकार के इस क़दम की घोर विरोधी हैं, फिर भी सरकार को समर्थन देना जारी रखेंगी! मुलायम और माया--- एक-दूसरे के दुश्मन, दोनों एफ़डीआइ विरोधी, लेकिन दोनों सरकार के साथ! दरअसल, अभी मुलायम मध्यावधि चुनाव चाहते हैं और मायावती. दोनों के अपने अलग-अलग कारण हैं. मुलायम को लगता है कि अभी उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार ऐसा कुछ कर नहीं सकी है कि चुनाव हों तो उनके सांसदों की संख्या में कोई उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हो पायेगी. उनका लक्ष्य है कि अगले लोकसभा चुनाव में कम से कम पचास-साठ सांसद तो उनकी पार्टी से जीतें ही, तो हो सकता है कि थर्ड फ़्रंट के प्रधानमंत्री के तौर पर उनका ही दाँव लग जाये! इस बीच, समर्थन की क़ीमत के तौर पर केन्द्र से उत्तर प्रदेश के लिए कोई बड़ा पैकेज भी खींच लेंगे!

उधर, मायावती को लगता है कि चुनाव जितनी देर में होंगे, उतना ही उनके लिए बेहतर होगा. माया राज की यादें अभी उत्तर प्रदेश के लोगों के दिलों में ताज़ा हैं, जैसे- जैसे दिन बीतेंगे, यादें धुँधलाती जायेंगी, मौजूदा सपा सरकार के ख़िलाफ़ कुछ 'एंटी- इन्कम्बेन्सी' होगी, इसलिए चुनाव 2014 में हों, यही उनके फ़ायदे में होगा! और जब तक अगले चुनाव नहीं होते, तब तक 'काँग्रेस का हाथ' मायावती को उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के 'पंजे' से भी बचा कर रखेगा.

तो कुल मिलाकर सबकी निगाहें अपने-अपने निशानों पर थीं और हैं. इसमें ग़रीब कहाँ, जनता कहाँ और देश कहाँ?   ये अलग बात है कि काँग्रेस आज सत्ता में है और देश की दुहाई दे रही है, लेकिन अगर आज वह विपक्ष में होती तो क्या वही कर रही होती जो आज तमाम दूसरी पार्टियाँ कर रही हैं? वह भी निस्सन्देह यही करती क्योंकि दुर्भाग्य से हमने ऐसी ही लोकतांत्रिक रूढ़ियों को सींचा है, जहाँ सब कुछ वोटों के आगे-पीछे घूमता है.

लेकिन आज ज़रूरत है बिलकुल नये तरीक़े से सोचने की और लोकतंत्र की नयी इबारतों को लिखने की, क्योंकि दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है, दुनिया के सोचने और काम करने के तरीक़े कहीं ज़्यादा तेज़ी से बदल रहे हैं. हम एक नयी विश्व व्यवस्था के मुहाने पर हैं, जिसमें भारत जैसे उभरते हुए देश के लिए अनन्त सम्भावनाएँ बन रही हैं. हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, आबादी के हिसाब से. क्या हम ये सपना नहीं देखें कि हमें सही अर्थों में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनना चाहिए, जो आर्थिक- राजनीतिक पटल पर दुनिया का नेतृत्व करे. आइए, सोचें कि भविष्य के एक ज़िम्मेदार लोकतंत्र का ख़ाका कैसा होना चाहिए, जिसमें वोटों की गिनतियों के बावजूद राजनीतिक दलों का आचरण ऐसे मार्गदर्शक सिद्धाँतों पर चले, जिसमें राजनीति लोक-हित के लिए हो. काँग्रेस और बीजेपी--- इन दो बड़ी पार्टियों को तो कम से कम इस बारे में गम्भीरता से सोचना चाहिए, क्योंकि अगले कुछ सालों तक भारत की राजनीति में इन दोनों बड़ी पार्टियों की ध्रुवीय भूमिका बनी रहेगी. देश का जो भी भविष्य लिखा जायेगा, उसमें ये दोनों पार्टियाँ अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकतीं.

(एफडीआइ मुद्दे पर चल रही राजनीतिक जोड़तोड़ पर लोकमत, नागपुर के लिए 22 सितम्बर 2012 को लिखा गया आलेख)