Wednesday, 24 April 2013

बलात्कार के ख़िलाफ़ चाहिए एक अभियान


दिल्ली में एक और बर्बर बलात्कार से देश हतप्रभ है. रूह कँपा देनेवाली इस घटना के बाद ग़ुस्सा, हताशा, लाचारगी का एक अजीब भाव हर तरफ़ पसर गया है. किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि बलात्कारियों के बढ़ते दुस्साहस पर लगाम कभी लग भी पायेगी या नहीं. सरकार निकम्मी है, पुलिस और न्यायिक तंत्र लुप्त हो चुका है, समाज सड़ गया है, मनुष्य होने के संस्कार मर चुके हैं या फिर ऐसा क्या है कि क़रीब-क़रीब रोज़ कहीं न कहीं से जघन्य बलात्कार और उस पर संवेदनहीन पुलिस तंत्र की निष्ठुर प्रतिक्रियाओं की दिल दहला देनेवाली कहानियाँ सुनने को मिलती हैं. 16 दिसम्बर के दिल्ली बलात्कार कांड के बाद देश भर में उपजे आक्रोश के बाद जो माहौल बना था, उससे लगा था कि शायद बलात्कार जैसे अपराध के प्रति पुलिस, प्रशासन, न्यायिक मशीनरी, सरकारों और राजनीतिक तंत्र के साथ-साथ समाज और लोगों पर ज़रूर कुछ न कुछ असर पड़ा होगा. लेकिन पिछले तीन महीनों की घटनाओं से स्पष्ट है कि केवल एक क़ानून के अलावा कहीं कुछ भी नहीं बदला.

क़ानून बदलने से क्या होगा अगर क़ानून का पालन कराने का कोई तंत्र हमारे पास न हो. और सिर्फ क़ानून बनाने से क्या होगा अगर हमारी सामूहिक राजनीतिक चेतना सड़कों पर उमड़े जनाक्रोश के तात्कालिक उफान में नहा-धो कर फिर अपनी तंद्रा के अलसाये तम्बुओं में दुबक जाय. हमें यह समझना ही पड़ेगा कि स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा एक ऐसी जटिल सामाजिक समस्या है, जिससे रातोंरात किसी जादुई चिराग़ से ख़त्म नहीं किया जा सकता. इसके लिए सामाजिक-राजनीतिक-प्रशासनिक-न्यायिक सभी मोर्चों पर पूरी ताक़त से एक साथ संगठित और दीर्घकालिक अभियान शुरू करना होगा और उन देशों के अनुभवों से सीख कर आगे बढ़ना होगा जो पुलिस और न्यायिक तंत्र के मामले में हमसे कहीं बेहतर माने जाते हैं और जिन्होंने यौन अपराधों के विरुद्ध ठोस क़दम उठाये हैं.

बात शुरू करने से पहले दुनिया के कुछ विकसित देशों की स्थिति पर नज़र डालते हैं. अमेरिका जैसे देश में भी बलात्कार के सिर्फ 12 प्रतिशत मामलों में ही अभियुक्त की गिरफ़्तारी हो पाती है और केवल 3 प्रतिशत मामलों में ही सज़ा हो पाती है. वहाँ भी बलात्कार के आधे से ज़यादा मामलों में महिलाएं पुलिस से शिकायत नहीं करतीं और केवल 46 प्रतिशत मामले ही पुलिस तक पहुँचते हैं (स्रोत: रेप, एब्यूज़ ऐंड इन्सेस्ट नेशनल नेटवर्क www.rainn.org). 'क्राइम सर्वे फ़ाॅर इंगलैंड ऐंड वेल्स 2013' के मुताबिक़ ब्रिटेन में तो बलात्कार के केवल 15 प्रतिशत मामलों में ही महिलाएं पुलिस में शिकायत दर्ज कराती हैं, केवल तीन प्रतिशत मामले अदालत तक पहुँच पाते हैं और केवल एक प्रतिशत मामलों में सज़ा हो पाती है.

ये आँकड़े बहुत चौंकानेवाले हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इनके बहाने हमारी सरकारें और पुलिस तंत्र अपने निकम्मेपन, अपनी संवेदनहीनता और जड़ता का किसी प्रकार बचाव करें. इन आँकड़ों को यहाँ देने का उद्देश्य सिर्फ यह अहसास कराना भर है कि हमारे सामने कैसी कठिन चुनौती है और उससे पार पाने के लिए हमें कितनी मुस्तैदी, कितनी आक्रामकता, कितने जुझारुपन, कितने मनोयोग के साथ कितनी लम्बी लड़ाई लड़नी होगी.

सबसे पहले पुलिस. महिलाओं के विरुद्ध होनेवाले किसी भी अपराध की जाँच एक ख़ास क़िस्म की संवेदनशीलता की माँग करती है. फिर बलात्कार तो एक ऐसा अपराध है, जहाँ पीड़ित और उसके परिजनों पर केवल शारीरिक आघात ही नहीं होता, बल्कि यह हमला उनके समूचे अस्तित्व पर होता है. लेकिन दिल्ली समेत देश भर में आम पुलिसकर्मी इन मामलों में किस तरह की बेशर्मी, कैसी अश्लील संवेदनहीनता, कैसी लिजलिजी मानसिकता और कैसे घिनौने रवैये का दिन-रात प्रदर्शन करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. दिल्ली, मुम्बई से लेकर आप शहरों-क़स्बों में किसी पुलिस थाने में पुलिसकर्मियों से दो-चार बात करके देखिए, आपको साफ़ पता चल जायेगा कि महिलाओं और उनके विरुद्ध होनेवाले अपराधों के बारे में आमतौर पर उनका नज़रिया क्या है. इसका कारण यही है कि हमारे यहाँ नीचे से ऊपर तक पुलिस के प्रशिक्षण का कोई ऐसा ढाँचा नहीं है, जो बदलते सामाजिक मूल्यों, परिवेश और चुनौतियों के सन्दर्भ में उन्हें लगातार तैयार करता रहे. दूसरी बात यह कि पदोन्नति और उनके 'परफ़ार्मेन्स अप्राइज़ल' के कुछ पारदर्शी और पूर्वनिर्धारित मानक होने चाहिए, जिससे केवल वही पुलिसकर्मी आगे बढ़ पायें, जिनके विरुद्ध लापरवाही, ढिलाई, लीपापोती या कदाचरण के आरोप न हों. इसी तरह, पुलिस के कामकाज से जुड़े तमाम दूसरे मुद्दे भी हैं, जिनमें राजनीतिक हस्तक्षेप भी एक बड़ा मुद्दा है और कुछ राज्यों में तो इस मामले में भयावह स्थिति है. पुलिस सुधारों को लेकर पिछले पता नहीं कितने बरसों से हम बातें ही बातें करते आ रहे हैं, काम हमने कुछ किया नहीं. जब तक हम पुलिस तंत्र में बुनियादी सुधारों के लिए कुछ नहीं करते, तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा. बस यह ज़रूर होगा कि कभी-कभार किसी बड़ी घटना पर हम दो-चार पुलिसवालों की बलि लेकर अपने घरों में लौट जायेंगे, अगली किसी घटना के होने तक.

दूसरी बात न्यायिक तंत्र. बलात्कार के ख़िलाफ़ कड़ा क़ानून तो बन गया, लेकिन इक्का-दुक्का फास्ट ट्रैक कोर्ट बना देने के अलावा तो न्यायिक व्यवस्था जस की तस लुँज-पुँज है. बरसों-बरस मामले घिसटते रहते हैं. जब तक मुक़दमा लटकता रहता है, पीड़ित परिवार बरसों-बरस एक अन्तहीन त्रासदी से गुज़रता रहता है. जो सज़ा अपराधी को मिलनी चाहिए, उससे कहीं बड़ा दंश पीड़ित और उसका परिवार झेलता है. बहुत बार उसके हौसले भी पस्त हो जाते हैं. न्याय के लिए कोई समयबद्ध सीमा होनी ही चाहिए कि ज़्यादा से ज्यादा दो साल के भीतर निचली अदालत को फ़ैसला सुना ही देना है और अगले दो साल के भीतर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से मामले का निबटारा हो ही जाय. तभी अपराधी को मिले दंड का कोई प्रभाव समाज पर पड़ेगा. वरना बरसों बाद कोई फ़ैसला आता है, तब तक पीढ़ियाँ बदल चुकी होती हैं, परिवार इधर से उधर चले गये होते हैं, लोग पुरानी बातों को भूल चुके होते हैं और किसी के लिए उस फ़ैसले का कोई ज़यादा मतलब नहीं रह जाता.

तीसरी बात यह कि बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा को लेकर एक व्यापक देशव्यापी जनजागरण अभियान चलाये जाने की ज़रूरत है. ख़ासतौर पर छोटी बच्चियों, लड़कियों और महिलाओं को जागरूक किया जाना चाहिए कि वे किस प्रकार भावी ख़तरे को पहचानें और ऐसी किसी भी हरकत से वे किस प्रकार अपना बचाव कर सकती हैं और उन्हें कैसे इस बारे में किसी न किसी को ज़रूर बताना चाहिए.

चौथी बात. कोई ऐसी नोडल राष्ट्रीय एजेन्सी होनी चाहिए, जो केन्द्र और राज्य सरकारों, पुलिस बल और तमाम दूसरी एजेन्सियों से तालमेल रखते हुए और बलात्कार और यौन अपराधों के बारे में कार्ययोजना बनाये, चलाये और समय-समय पर अपनी प्रगति की समीक्षा कर रणनीति तैयार करती रहे. राष्ट्रीय महिला आयोग की निगरानी में यह एजेन्सी काम कर सकती है.

पाँचवी बात. पिछले दिनों सरकार ने कहा था कि वह बलात्कारियों का एक राष्ट्रीय डेटा-बेस तैयार कर एक वेबसाइट पर उनकी तसवीरें लगायेगी. इसे जल्दी से जल्दी लाया जाना चाहिए और तमाम मनचलों और यौन अपराधियों को यहाँ सुशोभित किया जाना चाहिए. इन आरोपों का ब्योरा उनके आधार कार्ड और नागरिक पंजीकरण रजिस्टर से भी जोड़ा जाना चाहिए ताकि एक बार लगा दाग़ कभी धुल न पाये.
(दैनिक हिन्दुस्तान, 24 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित आलेख का मूल पाठ)

Wednesday, 10 April 2013

पाकिस्तान में ख़तरे की नयी घंटी

पाकिस्तान में ख़तरे की नयी घंटी बजी है. और हो सकता है कि अगले बीस-तीस बरसों में यह हमारे लिए अब तक की सबसे ख़तरनाक और सबसे जटिल चुनौती साबित हो. पाकिस्तान एक जवान देश है, उसकी कुल आबादी में दो-तिहाई हिस्सा उन लोगों का है, जिनकी उम्र अभी तीस साल से कम है. लेकिन बुरी ख़बर यह है कि इन नौजवानों में से 94 प्रतिशत युवा अपने देश की मौजूदा हालत से बेहद निराश हैं और मानते हैं कि उनका देश ग़लत दिशा में जा रहा हैं. यही नहीं, पाकिस्तान के क़रीब 70 प्रतिशत युवा अपने आपको धार्मिक पुरातनपंथी घोषित करते हैं और मानते हैं कि विदेशी विचार, संगीत, फ़िल्म और विदेशी मीडिया के 'कुप्रभाव' से युवा पीढ़ी को दूर रखा जाना चाहिए. इनमें से क़रीब 38 प्रतिशत युवा देश में शरीयत के शासन के समर्थक हैं, जबकि 32 प्रतिशत को लगता है कि सैनिक शासन ज़्यादा बेहतर विकल्प है. लोकतंत्र का समर्थन करनेवाले युवाओं की संख्या सिर्फ 29 प्रतिशत है. साफ़ ज़ाहिर है कि पाकिस्तान की आबादी का दो-तिहाई हिस्सा, उसका आम नौजवान प्रगतिशील विचारों, आधुनिक और उदार जीवन शैली, लोकताँत्रिक मूल्यों से कोसों दूर एक ऐसे प्रतिगामी, धर्मान्ध, सामन्ती और रूढ़िवादी वातावरण में जी रहा है, जो एक भयावह भविष्य की ओर ही संकेत करता है. इस युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा शहरी मध्य वर्ग से आता है और चिन्ता की बात है कि उसकी सोच भी ज़्यादा अलग नहीं है.

ये चौंकानेवाले निष्कर्ष अभी हाल में ब्रिटिश काउंसिल की 'नेक्स्ट जेनरेशन रिपोर्ट 2013' में सामने आये हैं. ब्रिटिश काउंसिल ने पाकिस्तान के सभी प्राँतों में शहरी और ग्रामीण युवकों और युवतियों के बीच ऐसे सर्वेक्षण की शुरुआत चार साल पहले की थी और 2009 में अपनी पहली रिपोर्ट जारी की थी. चिन्ता की बात यह है कि इन चार वर्षों में पाकिस्तानी युवाओं में आर्थिक मोर्चे पर निराशा और धार्मिक संस्थाओं के प्रति उनके समर्थन में काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई है. 2009 में केवल 50 प्रतिशत युवा मानते थे कि धार्मिक संस्थाएँ समाज में अपनी सही भूमिका निभा रही हैं, जबकि आज 74 प्रतिशत नौजवान धार्मिक संस्थाओं की भूमिका को सही मानते हैं. इसी तरह, चार साल पहले जहाँ 63 प्रतिशत युवा सेना को सम्मान की दृष्टि से देखते थे, वहीं आज 77 प्रतिशत युवा सेना की साख को अच्छा मानते हैं.

अपने जन्म के बाद से ही सेना, धार्मिक तंत्र और राजनीतिक षड्यंत्रों के कुचक्र में फँसा पाकिस्तान हमेशा से ही लोकतंत्र और उदारवादी सुधारों के लिए एक अंधी सुरंग रहा है. धार्मिक कट्टरता, जिहादी आतंकवाद और तालिबानी सोच की गिरफ़्त में जकड़े इस देश में पहली बार यह चमत्कार हुआ कि तमाम लड़खड़ाहटों के बावजूद किसी चुनी हुई सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया. ऊपर से देखने पर तो थोड़ी उम्मीद दिखती है कि जैसी भी सही, शायद अब बदलाव की शुरुआत हो चली है और लोकतंत्र का पौधा धीरे-धीरे बड़ा और मज़बूत होगा और उसके साथ-साथ दक़ियानूसी सोच की जगह पाकिस्तानी समाज में आधुनिक और प्रगतिशील विमर्श को धीरे-धीरे ही सही, लेकिन जगह मिलने लगेगी.

लेकिन वहाँ की नयी पीढ़ी की ताज़ा रिपोर्ट तो इसके बिलकुल उलट एक बेहद भयावह तसवीर पेश करती है. निष्कर्ष बिलकुल साफ़ है कि लोकतंत्र की विफलता और आर्थिक अँधियारे ने पाकिस्तान की पूरी युवा आबादी को एक ऐसी राह पर डाल दिया है, जिसकी दिशा को मोड़ पाने के लिए अभूतपूर्व राजनीतिक संकल्प और इच्छाशक्ति की ज़रूरत होगी, जिसका फ़िलहाल वहाँ कोई अता-पता नहीं दिखता. केवल दस प्रतिशत पाकिस्तानी युवा ही पूर्णकालिक रोज़गार में हैं, क़रीब एक-तिहाई युवा कुछ छोटा-मोटा काम या दैनिक मेहनत-मज़दूरी करते हैं और युवाओं की आधी आबादी बेरोज़गार है, जिनमें लड़कियों की भारी संख्या है, क्योंकि विवाहित-अविवाहित युवा लड़कियों में क़रीब 86 प्रतिशत घर की चहारदीवारी में ही रहती हैं और जो भविष्य में भी घर के भीतर ही रहेंगी. इनमें से सत्तर प्रतिशत लड़कियाँ घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. केवल दस प्रतिशत युवा ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें से ज़्यादातर शहरी लड़के हैं.

यह सारी बातें इसलिए बहुत गम्भीर हो जाती हैं कि इतने गहरे धार्मिक आग्रहों और पुरातनपंथी सामाजिक संरचना में जकड़े वहाँ के युवाओं के सामने अच्छे आर्थिक अवसर न के बराबर हैं, दूसरे इनके पास ऐसी कोई खिड़की नहीं है, जिससे नये विचारों की उजास मिल सके, तीसरी बात यह कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से न तो युवाओं को कोई आशा है और न ही ऐसा लगता है कि इस साल मई में होनेवाले आम चुनावों के बाद कोई ऐसी सरकार आयेगी, जो इस युवा-शक्ति की ऊर्जा को सही दिशा दे सकेगी या देना चाहेगी. ख़ास तौर से तब, जबकि धारा 62 और 63 के तहत इन चुनावों में नामांकन पत्रों की जाँच इस आधार पर भी की जा रही है कि उम्मीदवार नमाज़ी है या नहीं और वह इसलाम के धार्मिक नियमों-कर्तव्यों का पालन करता है या नहीं. राजनीतिक कार्यकलाप पर धर्म के इस अवाँछित वर्चस्व की प्रयोगशाला से जो भी सरकारनुमा चीज़ निकल कर बाहर आयेगी, वह कितने खुले ख़यालों और सुधारों की पक्षधर होगी, यह बात आसानी से समझी जा सकती है.

इसी सन्दर्भ में अभी एक और ताज़ा रिपोर्ट सामने आयी है. 'वेस्ट प्वाइंट' ने पाकिस्तान के कुख्यात आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा के नौ सौ मारे जा चुके आतंकवादियों के जीवन वृत्त का अध्य्यन कर कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण तथ्य पेश किये हैं. इसके अनुसार आमतौर पर 16 साल की उम्र में एक युवा लश्कर में भर्ती होता है और 21 साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते वह किसी न किसी आॅपरेशन में मार दिया जाता है. चौंकानेवाली बात यह है कि इनमें से क़रीब आधे आतंकवादियों की पढ़ाई मदरसों के बजाय सामान्य स्कूलों में हुई होती है और इनके परिवार इन्हें ख़ुशी-ख़ुशी आतंकवादी बनने और 'जिहाद में शहीद होने' के लिए भेजते हैं.
धर्मांन्धता के ऐसे पर्यावरण में जहाँ लश्कर जैसे संगठनों को इस प्रकार की सामाजिक स्वीकृति मिली हुई हो, जहाँ के एक बड़े भूभाग पर तालिबानियों की हुकूमत चलती हो, जहाँ ईशनिन्दा क़ानून के कुछ प्रावधानों की आलोचना करने के कारण पंजाब प्राँत के गवर्नर सलमान तासीर और धार्मिक अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज़ भट्टी की सरेआम हत्या हो जाय और लोग हत्यारों का सम्मान करें, वहाँ की नौजवान आबादी की ताज़ा तसवीर सचमुच बहुत डरावने संकेत देती है. भारत के लिए चिन्ता की बात यह है कि अगर पाकिस्तान में ज़मीनी स्थितियाँ तेज़ी से न सुधरीं (जिसके कोई आसार फ़िलहाल नहीं दिखते), तो अगले बीस वर्षों में वहाँ से निर्यात किया जानेवाला आतंकवाद हमारे लिए बहुत बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है, क्योंकि आर्थिक अंधी गली में फँसी हताश-निराश युवा ऊर्जा को धार्मिक उन्माद का मद बड़ी आसानी से अपना शिकार बना लेता है.
----------------------------------------
(दैनिक हिन्दुस्तान, 10 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित)

Tuesday, 9 April 2013

तीन तेरह में चौदह का गणित

पल-छिन, पल-छिन, धक-धक, धुक-धुक! नमो-नमो, नको-नको! रथों के रथी क्यों नहीं? रागा-रागा कि मसि-मसि? दिल्ली की राजनीतिक चौपड़ पर हर दिन नया थियेटर चालू आहे. तेरह के कैलेंडर की तारीख़ें जैसे-जैसे चौदह की तरफ़ बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे नये-नये गुल और गुलफ़ाम सामने आ रहे हैं. आडवाणी जी को अचानक राममनोहर लोहिया अच्छे लगने लगे तो 'मौलाना' मुलायम को श्यामाप्रसाद मुखर्जी सुहाने नज़र आने लगे.
अजीब चकरघिन्नी है भाई!
ऐसा लगता है कि तेरह के इस साल ने सबका तीन-तेरह कर दिया है. मुलायम नये-नये मंतर ढूँढ रहे हैं, काँग्रेस अकबकायी हुई है. नीतिश अपने पाँसे टटोल रहे हैं तो बीजेपी अपने ही तीरों से घायल दिख रही है. अगले चुनावों जैसा अबूझ चुनाव शायद ही देश में कभी हुआ हो.
बीजेपी में घमासान इस पर है कि पार्टी में किस 'लाल' की गोटी लाल हो? नमो भाई यानी गुजरात की धरती के तीसरे लाल (जैसा कि राजनाथ जी बता गये कि गुजरात की धरती से सरदार पटेल न उठ खड़े हुए होते तो भारत आज 'अखंड' न होता और गुजरात की धरती के दूसरे लाल महात्मा गाँधी के सपनों का भारत बनाने के लिए गुजरात की धरती के एक और लाल, नमो भाई नरेन्द्र मोदी को ही देश का क़र्ज उतारना है) की लाली बीजेपी के कई महारथियों को क़तई रास नहीं आ रही है. इन सभी महारथियों के रथी और छह-छह रथ-यात्राओं की जुगाली कर रहे लालकृष्ण आडवाणी मुलायम और लोहिया के क़सीदे पढ़ते हुए अचानक अयोध्या कांड का पाठ करने लग गये! क्योंकि अगर मोदी आ गये तो फिर इन महारथियों की औक़ात इतनी भी नहीं रह जायगी कि वे मोदी के रथ में पहियों की तरह भी काम आ सकें.
उधर, युवराज राग गा रहे काँग्रेसी अचानक अचकचा गये हैं कि 'रागा' यानी राहुल गाँधी की तान ठीक रहेगी या 'मसि' यानी मनमोहन सिंह की लिखी कहानी का ही तीसरा संस्करण छापने की जुगत भिड़ायी जाय. हाथ वालों को वह हाथ नहीं सूझ रहा है, जिसे थाम कर वे चुनावी वैतरणी की तरफ़ बढ़ें? इत्ती दुविधा क्यों है बन्धु?
बीजेपी और आरएसएस को तो कोई दुविधा अब तक नहीं थी. उन्हें तो लग रहा था कि इस बार मोदी के 'सुदर्शन चक्र' से वे मैदान मार लेंगे. और सच कहें तो बीजेपी और संघ के पास मोदी से बेहतर कोई और पत्ता है ही नहीं. सब जानते हैं कि मोदी की तमाम सीमाएँ हैं, अंतर्राष्ट्रीय मंचों से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक, तरह-तरह के सवाल हैं. ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन की तरफ़ से तो दरवाज़े खुल गये, लेकिन अभी बहुत-कुछ बाक़ी है. अमेरिका का रुख़ नरम पड़ भी जाय तो अरब देशों के साथ सम्बन्ध कैसे होंगे, इसका कोई संकेत अब तक नहीं मिला है. राष्ट्रीय राजनीति में भी सवाल बने ही हुए थे. नीतिश कुमार तो पहले से ही लाल झंडी दिखा रहे हैं, लेकिन चुनावों के बाद अगर सहयोगियों की ज़रूरत पड़ी (जोकि पड़ेगी ही), तो नये सहयोगी कहाँ से आयेंगे. एक जयललिता को मोदी अपने पाले में गिन सकते हैं, लेकिन क्या ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, जगन रेड्डी या चन्द्रबाबू नायडू, मुलायम या मायावती में से कोई मोदी का कमल खिलाने को तैयार होगा? ये सारे सवाल थे, इसके बावजूद संघ अगर मोदी को अपना 'ब्रह्मास्त्र' मान रहा था, तो वह कुछ भी ग़लत नहीं सोच रहा था. मोदी के अलावा आज बीजेपी के पास ऐसा कौन-सा नेता है, जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ कर पार्टी उम्मीद कर सके कि कम से कम वह इतनी सीटें तो जीत सके, जितनी इस लोकसभा में उसके पास हैं.
यही कारण है कि तमाम असहजताओं के बावजूद संघ के लिए मजबूरी का नाम मोदी है. मोदी के पास कम से कम तीन बड़े हथियार हैं, जिनसे संघ को बड़ी उम्मीदें हैं. पहला विकास, दूसरा हिन्दुत्व की अन्तर्निहित छवि (जिसके लिए मोदी को किसी नये हिन्दुत्ववादी नारे की ज़रूरत नहीं है) और तीसरा 'दबंग' नेता के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकनेवाला व्यक्तित्व. यहाँ तक तो सब ठीक था, लेकिन पार्टी के बाक़ी नेताओं को जो बात पच नहीं रही है, वह है मोदी का 'मैं' और 'मेरे सिवा कोई नहीं.' मोदी पिछले दस सालों से गुजरात में बीजेपी और संघ को जेब में रख कर टहलते रहे हैं. किसी को उन्होंने कभी कुछ नहीं समझा. पार्टी का जो भी नेता कभी गुजरात गया, वह मोदी की दया पर ही वहाँ रहा. ऐसे में मोदी अगर राष्ट्रीय राजनीति में आते हैं तो सबको डर है कि वह बाक़ी दिग्गजों को एक-एक कर ठिकाने लगा देंगे और यह डर बेबुनियाद भी नहीं. जैसे-जैसे पार्टी के बाक़ी नेताओं को इस 'ख़तरे' का एहसास होता गया, वैसे-वैसे मोदी के दिल्ली कूच को रोकने की कोशिशें शुरू हो गयीं. और अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि संघ, बीजेपी और मोदी इस नयी चुनौती से कैसे निपटें? इस बात की क्या गारंटी है कि मोदी के नेतृत्व में अगर चुनाव लड़ा गया तो पार्टी में बड़े पैमाने पर अन्तर्घात नहीं होगा? अब बीजेपी की सबसे बड़ी धुकधुकी यही है.
उधर, काँग्रेस में भी सम्भवतः सहसा ही कोई आत्मबोध हुआ लगता है कि चुनावी शतरंज में ' रागा' यानी राहुल गाँधी को राजा की तरह उतारा जाय या नहीं? अगर उन्हें भविष्य के प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करते हुए काँग्रेस चुनाव लड़ती है तो इससे दो बड़े ख़तरे हैं. पहला यह कि लड़ाई मोदी बनाम राहुल हो सकती है, जो नाक की लड़ाई बन सकती है. दूसरा यह कि नतीजे अगर कहीं बिहार और उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावों की तरह ही ख़राब आ गये तो युवराज की बड़ी छीछालेदर होगी. इसलिए मजबूरी का नाम 'मसि' यानी फ़िलहाल मनमोहन सिंह की पर्ची लेकर चलिए, आगे की बात चुनाव बाद देखी जायगी! राहुल या मनमोहन सिंह-- काँग्रेस की धुकधुकी यही है. और मुलायम और नीतिश टकटकी लगाये देख रहे हैं, आगे-आगे होता है क्या?
-------------------------------
(अमर उजाला, 9 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित)