Thursday, 12 December 2013

'आप' ने क्यों सबको साँप सुँघा दिया?


'आप' ने सबको साँप सुँघा दिया है. उनकी हालत तो पतली है ही, जिनके हाथ की भाग्य रेखा इस चुनाव में देखते ही देखते सफ़ाचट हो गयी. लेकिन जो चौतरफ़ा जीते, उन हुँकार वालों की भी धुकधुकी लग गयी है. और सूबों के क्षत्रपों के भी दिल बैठने लगे हैं. 'आप' की झाड़ू ने राजनीति के तमाम टोटकों को ठिकाने लगा दिया. चुनाव के पहले और चुनाव के बाद, हर मौक़े पर कामयाबी की पूरी गारंटी वाले अचूक ख़ानदानी नुस्ख़े इस बार कुछ काम नहीं आये, वरना अब तक दिल्ली में तीन-तिकड़म से सरकार बनाने का जुगाड़ कब का हो चुका होता! 

भारतीय राजनीति में यह अजूबा सचमुच पहली बार हो रहा है कि सबसे ज़्यादा सीटें जीतनेवाली पार्टी को ज़रा भी इच्छा नहीं हो रही है कि वह सरकार बनाने की कोशिश करे! यह वही पार्टी है जो केन्द्र में तेरह दिन की सरकार बनाने के लिए लड़ मरी थी. आज उसे जोड़तोड़ कर सरकार बनाना अनैतिक लगने लगा है! झारखंड भी अभी कोई कालातीत इतिहास नहीं हुआ है कि लोगों को याद न आये कि बीजेपी ने वहाँ सरकार बनाने या सरकारों में बने रहने के लिए कैसे-कैसे अद्भुत कौशल दिखाये थे. लेकिन आज वह बहुमत से केवल चार के आँकड़े से दूर रह जाने के बावजूद कान पकड़े बैठी है कि न बाबा न, हम 'अनैतिक' तरीक़ों से सरकार नहीं बनायेंगे! 

'आप' यानी आम आदमी पार्टी का यही असर और आतंक है, जिसने राजनीति के ढर्रे को बदलने की शुरुआत की है. और, दरअसल, यह आतंक पार्टी का नहीं, बल्कि सचमुच आम आदमी का है. 'आप' के बहाने आम आदमी ने राजनीति में सीधे हस्तक्षेप की शुरुआत कर दी है. हाल के विधानसभा चुनावों की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही है कि आम आदमी ने दिल्ली में एक नये राजनीतिक प्रयोग की नींव रखी, आम आदमी पहली बार ख़ुद चुनाव लड़ा और जीता और पके-पकाये राजनेताओं और राजनीति के तमाम घाघ खिलाड़ियों के हर छल-बल को उसने अपनी मामूली-सी हस्ती के बावजूद बेअसर कर दिया. अब यह अलग बात है कि रामलीला मैदान में जब जनलोकपाल की माँग को लेकर अन्ना हज़ारे आमरण अनशन कर रहे थे, तब लबालब अहंकार से भरे इन्हीं राजनेताओं ने ताने मार-मार कर आम आदमी की बड़ी खिल्ली उड़ायी थी कि ऐसे ही क़ानून बनाने का बड़ा शौक़ है तो राजनीति में उतर कर देखो. अन्ना और आन्दोलन से जुड़े तमाम सहयोगियों-समर्थकों के भारी  विरोध के बावजूद जब 'आप' नाम की पार्टी बनी तब किसी ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया था. लेकिन 'आप' ने अब तक अपने बारे में लगायी जा रही तमाम अटकलों, आशंकाओं, अनुमानों और आकलनों को पूरी तरह ग़लत साबित किया है. 

'आप' के अलावा भी इस बार के विधानसभा चुनाव इसलिए बड़े कौतूहल से देखे जा रहे थे कि इन्हें 2014 की लड़ाई की अँगड़ाई माना जा रहा था. बात सही भी है. देश के राजनीतिक इतिहास में ऐसा चुनावी युद्ध शायद ही पहले कभी हुआ हो. नेतृत्व के संकट से जूझ रही काँग्रेस अपने अस्तित्व के लिए छटपटा रही है, बीजेपी को लगता है कि यह उसके लिए 'अभी नहीं तो कभी नहीं' जैसा मौक़ा है और नरेन्द्र मोदी के आक्रामक नेतृत्व में वह देश की राजनीति की धारा बदल सकने के सर्वोत्तम अवसर के मुहाने पर खड़ी है. उधर मुलायम, माया, ममता, जयललिता, नीतिश, नवीन, जगन, चन्द्रबाबू समेत तमाम सूबाई क्षत्रपों को लगता है कि यही मौक़ा है, जब चुनाव बाद उनकी बड़ी भूमिका हो सकती है और कौन जाने देवेगौड़ा और गुजराल की तरह किसी का प्रधानमंत्री बनने का नम्बर भी लग जाये! अब तक यह सब गणित ठीक चल रहा था, लेकिन दिल्ली फ़तह के बाद 'आप' के 'भारत विजय' के इरादों ने अब तक बड़ी मेहनत से सजाई गयी  चौसर में नये पाँसे फेंक कर पूरा खेल तहस-नहस कर दिया है.

'आप' के साथ समस्या यह है कि परम्परागत राजनीति के दाँव से न यह खेलती है और न वे इस पर असर करते हैं. यह अनुमान भी नहीं लग पाता कि कहाँ इसके उम्मीदवार मज़बूत हैं और कहाँ कमज़ोर, कहाँ इसके समर्थक कम हैं, कहाँ ज़्यादा, क्योंकि इसके समर्थकों की कोई ख़ास पहचान है ही नहीं. इसके चुनाव प्रचार से भी पकड़ पाना मुश्किल होता है कि कहाँ इसकी अपील है और कहाँ नहीं. न बड़ी रैलियाँ और न न्यूज़ चैनलों पर 'लाइव प्रसारित' हो सकने वाले भाषण! इसलिए पता ही नहीं चलता कि वे चुनाव लड़ भी रहे हैं या नहीं, लड़ पा रहे हैं या नहीं. दिल्ली में यही हुआ. मतदान के बाद तक बड़े-बड़े चुनावी पंडितों, एक्ज़िट पोल मास्टरों को 'आप' की कोई हवा ही नहीं लग सकी! 

ऐसे में लोकसभा चुनावों में उतरने का 'आप' का फ़ैसला बीजेपी समेत सभी पार्टियों के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है. कारण यह है कि काँग्रेस-विरोध की मौजूद लहर में 'आप' बहुत-से लोगों को एक नया विकल्प देती है. दिल्ली के नतीजे इसका सबूत हैं. अगर यहाँ 'आप' मैदान में न होती तो बीजेपी शायद  50 से भी ज़्यादा सीटें जीतती! बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहाँ बीजेपी बड़ी फ़सल काटने के लिए पूरी ताक़त झोंक रही है, 'आप' वहाँ न केवल नरेन्द्र मोदी और बीजेपी के लिए 'स्वप्नभंग' का कारण बन सकती है, बल्कि मुलायम, मायावती, नीतिश और लालू छाप राजनीति को भी बड़े झटके दे सकती है. हालाँकि अभी कोई राजनीतिक पंडित यह मानने को क़तई तैयार नहीं है कि इन राज्यों के जातीय गणित को तोड़ पाना तो दूर, कभी कोई खरोंच भी लगा सकता है. लेकिन 'आप' ने दिल्ली के दलित वोटों में भारी सेंध लगा कर ख़तरे की घंटी बजा ही दी है. आम आदमी को 'आप' के ज़रिये देश के राजनीतिक पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का जो मौक़ा मिला है, उसके नतीजे न केवल अगले लोकसभा चुनाव को गहरे प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि दूसरे राजनीतिक दलों को नैतिकता की टोपी पहनने को भी मजबूर कर सकते हैं! विधानसभा चुनावों का सबसे बड़ा नतीजा यही है.
( ---क़मर वहीद नक़वी, 'अमर उजाला', 12 दिसम्बर, 2013)