Sunday, 17 February 2013

असम हिंसा के यक्ष प्रश्न


असम हिंसा के यक्ष प्रश्न



"हम बार-बार इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि हमारे पड़ोस में हमारा एक ऐसा 'दोस्त' है जो हमसे अपनी दुश्मनी कभी नहीं छोड़ सकता क्योंकि उसका समूचा अस्तित्व ही 'ऐंटी-इंडिया' की हाइपोथीसिस' पर टिका हुआ है. हमें अपनी भविष्य की पाकिस्तान नीति पर फिर से और अत्यन्त गम्भीरता से सोचना होगा और उसमें 'रिज़ल्ट-ओरियेण्टेड' बदलाव लाने होंगे."


 देश के कई हिस्सों से उत्तर पूर्व के लोगों का पलायन और मुम्बई के बाद उत्तर प्रदेश के कई शहरों में मुसलमानों के हिंसक प्रदर्शन का सिलसिला  निश्चित तौर पर एक गहरी साज़िश का नतीजा लगता है. यह बड़ी चिन्ता की बात है कि देश का ख़ुफ़िया तंत्र जहाँ इस साज़िश की बू सूँघ पाने में पूरी तरह विफल रहा, वहीं हमारे प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र को भी जागने और स्थिति की भयावहता का अनुमान लगा पाने में इतनी देर लग गयी. सरकार, प्रशासन, ख़ुफ़िया तंत्र और मीडिया-- सभी इस ख़तरे को भाँप पाने में इस हद तक विफल क्यों रहे? क्या इस लिए कि इस मामले की शुरुआत असम जैसे एक राज्य से हुई थी, जो देश के 'मेन लैण्डस्केप' से दूर कहीं हाशिये पर है और सभी यह माने बैठे थे कि यह केवल स्थानीय स्तर पर पसरे एक जातीय तनाव का मामला है और एक सीमित दायरे के भीतर ही रहेगा और स्थानीय प्रशासनिक मशीनरी इसे अपने स्तर पर नियंत्रित कर लेगी. शुरुआती तौर पर ऐसा सोचना शायद ग़लत भी नहीं था क्योंकि असम में ऐसे जातीय संघर्ष कोई नयी बात नहीं हैं.

लेकिन इस बार कई नयी बातें हो रही थीं, जिन पर शायद किसी का भी ध्यान नहीं गया. सबसे बड़ी बात यह कि पड़ोसी देश पाकिस्तान में भारत के ख़िलाफ़ एक नये लेकिन बेहद ख़तरनाक साइबर युद्ध की ज़हरीली साज़िश रची जा रही है, हमें इसकी रत्ती भर भी भनक नहीं लगी. हम बार-बार इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि हमारे पड़ोस में हमारा एक ऐसा 'दोस्त' है जो हमसे अपनी दुश्मनी कभी नहीं छोड़ सकता क्योंकि उसका समूचा अस्तित्व ही 'ऐंटी-इंडिया' की हाइपोथीसिस' पर टिका हुआ है. हमें अपनी भविष्य की पाकिस्तान नीति पर फिर से और अत्यन्त गम्भीरता से सोचना होगा और उसमें 'रिज़ल्ट-ओरियेण्टेड' बदलाव लाने होंगे.

यही नहीं, घटनाओं की यह श्रृंखला हमारी अब तक की अपनी आन्तरिक राजनीितक- सामाजिक समझ के स्वार्थकेन्द्रित पहलुओं और बुनियादी समस्याओं का सामना करने से लगातार कतराते रहने की प्रवृत्ति को भी पूरी तरह उघाड़ कर रख देती है. आइए, ज़रा कुछ सवालों पर ग़ौर करें:
यहाँ दो बड़े और बुनियादी सवाल हैं. पहला, ऐसे तमाम मुद्दों पर, जहाँ वोटों को खोने-पाने की ज़रा भी स्थिति बन रही होती है, हमारा राजधर्म हमेशा अपने राष्ट्रधर्म की बलि चढ़ा कर अपने राजनीतिक स्वार्थों को सर्वोपरि क्यों रखता है? और दूसरा, यह जानते हुए भी कि उत्तर-पूर्व के राज्यों की समस्या क्या है और वहाँ के लोग लगातार अपने को बाक़ी देश से कटा हुआ महसूस करते रहे हैं, चाहे वे देश की राजधानी दिल्ली में रहते हों या मुम्बई, बंगलूर जैसे महानगरों में--- उन्हें देश की मुख्यधारा में लाने और देश की बाक़ी जनता के मन में उनके प्रति मौजूद अनर्गल पूर्वग्रहों को दूर करने के लिए भाषणों के अलावा पिछले 65 सालों में और कुछ क्यों नहीं किया गया? वैसे दुर्भाग्य से यही शिकायत मुसलमानों को भी है कि वे आज तक देश की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाये और मुसलिम तुष्टिकरण के तमाम राजनीतिक आरोपों के बावजूद वे केवल आर्थिक रूप से बहुत पिछड़े हैं, बल्कि सामाजिक- राजनीतिक कैनवस पर भी 'डेकोरेटिव पीस' की तरह यहाँ-वहाँ इक्का-दुक्का पदों पर कभी-कभार बैठा दिये जाने के अलावा उनकी कहीं कोई ख़ास भूमिका नहीं है. लेकिन मुसलमान जहाँ तथाकथित हिन्दुत्व और सेकुलरिज़्म की राजनीतिक चक्की के बीच पिसते रहने को अभिशप्त हैं और सेकुलरवादी राजनीतिक पार्टियाँ 'मुसलिमपरस्ती' के आरोपों से बचने के लिए लुकते-छिपते यदा-कदा कुछ ऐसे टुकड़े उनकी ओर उछालती रहती हैं, जो उन्हें पिछड़ेपन और एक ख़ास तरह के अनपढ़पन से बाहर आने ही नहीं देता. लेकिन, उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ तो तथाकथित तुष्टिकरकरण के किसी राजनीतिक आरोप की कोई गुंजाइश नहीं थी, फिर क्यों आज़ादी के बाद से अब तक वहाँ के लोग देश के उन्नत महानगरों तक में डरे- सहमे, कटे-कटाये ही रहते आये?

उत्तर-पूर्व के लोग आख़िर यह भरोसा क्यों नहीं कर पाये कि एसएमएस और सोशल मीडिया पर उनके बारे में जो कुछ कहा गया, वक़्त आने पर पुलिस, प्रशासन और जनता, उनकी कालोनी या मुहल्ले के लोग सचमुच उनकी मदद को जायेंगे. जब तक उन्हें यह भरोसा हो, वे आख़िर किसके भरोसे वहाँ रुके रहें और क्यों? यही सवाल सबसे बड़ा है कि आख़िर उन्हें यह भरोसा क्यों नहीं हो सका? इसी सवाल को अगर हम इस तरह पूछें कि उन्हें आख़िर ऐसा भरोसा होना ही क्यों चाहिए कि उनकी कालोनी और मुहल्ले के लोग उनकी मदद के लिए खड़े होंगे, तो शायद उत्तर मिल जायेगा. पुलिस हर जगह, हर वक़्त तो मौजूद रह नहीं सकती, इसलिए सुरक्षा देने के प्रशासन के तमाम आश्वासनों के बावजूद उन्हें सुरक्षा का एहसास तभी होता जब उन्हें यह भरोसा हो कि उनके पड़ोसी सचमुच उन्हें अपने जैसा और अपना हिस्सा मानते हैं. अपने दिलों पर हाथ रख कर जवाब दें कि क्या पिछले बीस-तीस सालों में कभी हमने अपने इन भाइयों और बहनों को अपनेपन का एहसास दिलाने के लिए कुछ भी किया है?

अब दूसरी बात मुसलमानों के अचानक उभरे आक्रोश की. अब यह बात सामने आयी है कि असम और म्यान्मार में मुसलमानों पर हुए कथित 'अत्याचारों' की झूठी- फ़र्ज़ी और बेबुनियाद कहानियाँ और तसवीरें मुसलमानों को बरगलाने के लिए एक साज़िश के तहत उनके बीच फैलायी गयीं. अब तो यह बात पक्के तौर पर साबित हो चुकी है कि भारतीय मुसलमानों को साम्प्रदायिक उन्माद का मुहरा बनाने की यह साज़िश पाकिस्तान में रची गयी, लेकिन अभी यह सामने आना बाक़ी है कि भारत में उनके प्यादे कौन थे?

शायद बहुत कम मुसलमानों को मालूम हो कि असम में बोडो आदिवासियों का संघर्ष वहाँ के स्थानीय मुसलमानों के साथ नहीं, बल्कि बांग्लादेशी मुसलमानों के साथ चल रहा है. असम के 25 लाख मूल असमी मुसलमानों के प्रतिनिधि संगठन एसएजीएमजेपी ने इत्र व्यापार से राजनीति में आये बदरुद्दीन अजमल की पार्टी आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट ( एआइयूडीएफ़) को असम में साम्प्रदायिक हिंसा भड़काने का दोषी ठहराया है. अजमल की पार्टी की ताक़त बांग्लादेशी मुसलमान ही हैं और मूल असमी मुसलमान उससे लगभग कटा हुआ है. बदरुद्दीन अजमल साम्प्रदायिक उफान वाले भाषणों के लिए जाने जाते हैं और बांग्लादेशी मुसलमानों के ध्रुवीकरण के चलते ही पिछले विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 18 सीटें जीती थीं.

तो देश का मुसलमान इन बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए इस क़दर 'परेशान' क्यों हुआ? असम के मूल मुसलमानों का जिस विवाद से कोई लेना-देना नहीं हो और जो लोग देश के बाहर से कर देश पर बोझ की तरह यहाँ बसे हों, उनके लिए देश में आग लगाने की साज़िश किसने की? यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पिछले कुछ सालों से बदरुद्दीन अजमल की महत्तवाकांक्षाएँ ज़ोर मार रही हैं और वह देश के दूसरे हिस्सों में भी पैर पसारने की कोशिशों में लगे हैं. मुम्बई में भी मुसलमानों को भड़काने की साज़िश के पीछे भी ख़ुफ़िया एजेन्सियों को अजमल का ही हाथ होने का शक है. जिस सुनियोजित तरीक़े से देश भर में मुसलमानों को बरगलाने और भड़काने की साज़िश की गयी, उससे साफ़ है कि इसके पीछे कोई कोई बड़ा और शातिर संगठन होना चाहिए.

सवाल यही है कि मुसलमानों का एक हिस्सा कैसे इस तरह की बरगलाहटों के झाँसे में जाता है. हमारी तमाम राजनीतिक पार्टियों को, मुसलिम बुद्धिजीवियों को, मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं को, मुसलिम राजनेताओं और मौलानाओं को और आम मुसलमानों को इस बारे में ईमानदारी से सोचना चाहिए. आम मुसलमानों को यह बात समझनी पड़ेगी कि 'वोट बैंक' के आगे भी उनकी कोई तक़दीर है, लेकिन वहाँ तक पहुँचने की बात सोचने के पहले उन्हें राजनीति की बिसात पर मुहरा बने रहने के लाॅलीपाॅप को छोड़ना पड़ेगा. मुसलमानों का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वे एक नेतृत्वविहीन समूह हैं और नेतृत्व के नाम पर उनके पास जो कुछ है, वह है राजनीतिक पार्टियों की अलग-अलग पोशाकों में घूम रहे कुछ लोग, जिनका मक़सद मुसलमानों का हित सोचने के बजाय ये तरकीबें सोचते रहना है कि मुसलमानों को किस तरह ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में हाँक कर अपनी पार्टी के बाड़े में लाया जा सकता है ताकि पार्टी में मुसलिम नेता के तौर पर उनकी सीट बरक़रार रहे. दरअसल, मुसलमानों को समझना चाहिए कि उन्हें ऐसा नेता चाहिए, जो जोशीले भाषणों से तालियाँ बजवाने के बजाय दिमाग़ों को रोशन करना जानता हो.

(असम में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान उत्तर -पूर्व के लोगों के पलायन पर लोकमत, नागपुर के लिए 20 अगस्त 2012 को लिखा गया आलेख) 


   

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