Making of a Hindu Rashtra.
विकलांग
हैं. खड़े नहीं हो
सकते. तो फिर या
तो सिनेमा देखने मत जाइए और
अगर बहुत ही शौक़
हो, जाना ही हो
तो साथ में बड़ा-सा साइनबोर्ड लेकर
जाइए. सारी दुनिया को
बताइए कि आप विकलांग
हैं, इसलिए राष्ट्रगान के समय उठ
कर खड़े नहीं हो
सकते! वरना कोई पढ़ा-लिखा, सभ्य-सुसंस्कृत, 'राष्ट्रवादी'
दम्पति आपको पीट देगा.
और भीड़ बड़ी हो
गयी तो मार भी
डाले, तो हैरानी क्या?
यह घटना पणजी में
हुई. और कहीं भी
हो सकती थी. कहीं
भी हो सकती है.
देश का ताज़ा समाचार
यही है!
कहनेवाले
जैसे हमेशा कहते हैं, इसे
भी कह देंगे कि
'छोटी-सी' बात है.
लेकिन ऐसी 'छोटी-मोटी'
बातों का कितना बड़ा,
कितना लम्बा सिलसिला है? कितनी बड़ी
डिज़ाइन है? ध्यान से
देखिए. देश का एक
नया चेहरा गढ़ा जा रहा
है, पिछले अट्ठाईस महीनों से रच-रच
कर, सोच-समझ कर.
एक उन्मादी 'हिन्दू राष्ट्र' तैयार हो रहा है.
छेनियाँ-हथौड़ियाँ चल रही हैं,
छिजाई-घिसाई हो रही है,
कटाव-छँटाव हो रहा है,
कुछ-कुछ शक्ल उभरने
भी लगी है, एक
ऐसे राष्ट्र की जहाँ प्रश्न
न हों, तर्क न
हों, विचार न हों, बहस
न हो, बाक़ी सब
हो. और जो हो,
वह बस उस 'राष्ट्रवादी'
लकीर पर हो, जो
नागपुर से तय होती
हो! नागरिक हों, लेकिन सब
'राष्ट्रवादी' हों, सारे वोटर
'राष्ट्रवादी' हों, राजनीतिक पार्टी
'राष्ट्रवादी' हो! और आप
जानते हैं कि देश
में तो सिर्फ़ एक
ही 'राष्ट्रवादी' पार्टी है! और इस
'राष्ट्रवाद' की परिभाषा क्या
है, एक राष्ट्र, एक
सम्प्रदाय, एक देवता, एक
भाषा और अन्त में
इसमें जोड़ दीजिए एक
पार्टी!
आज
जो हो रहा है,
उस पर मुझे तो
कोई हैरानी नहीं. यह 'मोहिन्दुत्व' है,
जिस पर मैंने साढ़े
तीन साल पहले लिखा
था. लोकसभा चुनावों के भी क़रीब
सवा साल पहले. जब
तीर्थराज प्रयाग में साधु-सन्तों
के जमावड़े के बीच नरेन्द्र
मोदी को प्रधानमंत्री बनाने
का संकल्प लिया गया था.
तब 'मोहिन्दुत्व' संघ का नया
धाँसू काकटेल था, यानी मोदीत्व
के विकास के शीरे में
घुला हिन्दुत्व का रसायन! इसकी
मार्केटिंग आसान थी. बाज़ार
में विकास के बहुत ख़रीदार
थे. लक्ष्य साधने के लिए यह
हथियार कारगर माना गया था.
और समय ने साबित
कर दिया कि संघ
ने ग़लत नहीं सोचा
था.
लेकिन
संघ का एजेंडा 'हिन्दुत्व'
नहीं, बल्कि 'हिन्दू राष्ट्र के निर्माण' का
है. इसीलिए मोदी सरकार बनते
ही एलान हुआ कि
आठ सौ साल बाद
देश में हिन्दुओं का
शासन लौटा है. अशोक
सिंहल का बयान याद
कीजिए. और फिर देश
में 'सर्जिकल स्ट्राइक' शुरू हो गयी.
चुन-चुन कर 'दुश्मन'
गढ़े गये. निशाने तय
किये गये. ईसाई, मुसलमान,
दलित, सेकुलर, एनजीओ जो सरकार के
अनुकूल न हों! गिनते
जाइए. देश में कितने
'छोटे-छोटे' मामले हुए. पहले चर्चों
पर हमले हुए, फिर
रहस्यमय तरीक़े से अचानक रुक
गये. अब बहुत दिनों
से किसी चर्च पर
हमले की कोई ख़बर
क्यों नहीं आती? कुछ
दिनों पहले कुछ ईसाई
एनजीओ के विदेशी चन्दे
रोक दिये गये गये
थे, यह कह कर
कि वे धर्मान्तरण कराते
हैं. अभी अमेरिकी विदेश
मंत्री जान केरी के
हस्तक्षेप के बाद रोक
हट गयी!........
'राग देश' में स्तम्भकार क़मर वहीद नक़वी के इस लेख को पूरा पढ़ने के लिए इस लिंक को क्लिक कीजिए.

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